कर्नल जिसने बुलंद की गूजरों की आवाज़

कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला
    • Author, नारायण बारेठ
    • पदनाम, जयपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

वो फिर सुर्ख़ियो में है. किसी के लिए वो उनके हक़ के सिपाही हैं तो किसी के लिए एक अबूझ पहेली.

गुर्जर नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला जब अपने स्वजातीय गूजरों के साथ विरोध के लिए निकलते है, रेलपटरिया गाड़ियों से महरूम हो जाती है, राजमार्गो पर जीवन ठहर जाता है.

बैंसला आती-जाती सरकारों के लिए एक ऐसा मुहावरा बन गए है जिसे न तो कोई सरकार टाल सकती है और ना ही पाल सकती है.

बकौल ख़ुद बैंसला के वो मुग़ल शासक बाबर से भी प्रभावित हैं और अब्राहम लिंकन के मुरीद भी.

बैंसला एक बार फिर अपने लोगों के साथ राजस्थान के भरतपुर ज़िले में दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग पर जा बैठे हैं.

गूजरों का रेल रोको आंदोलन

वे अपनी बिरादरी और चार अन्य छोटी जातियों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग कर रहे हैं.

सिर पर चटक रंग की पगड़ी और ठेठ गवई धोती बांधे बैंसला अंग्रेज़ी पत्रकारों से अंग्रज़ी में बात करते हैं हिन्दी पत्रकारों से हिन्दी में.

जब वो अपने समर्थकों से बात करते हैं तो उन्हीं की बोली में.

पूछने या टोकने पर मसीहाई अंदाज में बैंसला कहते हैं, "मैं सदियों से वंचित इन ग़रीब लोगों की ज़िंदग़ी में तरक्क़ी का उजाला भरना चाहता हूँ."

पूर्वी राजस्थान के करौली ज़िले के एक गाँव में पैदा हुए बैंसला धरने प्रदर्शन के बीच अपने पढ़ने का वक़्त भी निकाल लेते है.

मैंने उनसे पूछा कि कोई ऐसा व्यक्तित्व जो आपको प्रभावित करता हो? ‘एक विचारक के बतौर अब्राहम लिंकन मेरे आदर्श हैं.'

कर्नल किरोड़ी बैंसला

बैंसला उस उम्र में विवाह की डोर में बंध गए जिसे बालपन कहा जाता हैं. लेकिन वे तालीम के लिए कृतसंकल्प थे.

पढ़ना-लिखना नहीं छोड़ा पहले पढ़ लिख कर टीचर बन गए फिर अपने पिती की तरह फ़ौजी.

सन 1962 और 1965 की जंग में देश के लिए लड़े. बहादुरी के कारण सिपाही से लड़ते लड़ते कर्नल के ओहदे तक पहुँचे. उनके फ़ौजी साथी उन्हें रॉक ऑफ़ जिब्राल्टर कहते थे.

पहले देश के लिए के लिए लड़े बैंसला अब देश से आरक्षण के लड़ रहे हैं.

उनके दो बेटे फ़ौज में है, एक पुत्र प्राइवेट क्षेत्र में कार्यरत है और एक पुत्री अखिल भारतीय सेवा में अधिकारी है.

बैंसला राजनीति के पक्के खिलाड़ी भले लगते हों लेकिन सार्वजनिक मंच पर वो पहली बार तब प्रकट हुए जब उन्होंने बीहड़ कंदराओं में सहेज कर रखे गए गूजरों के युद्धक नृत्य की प्रस्तुति के लिए अपने समाज को जमा किया.

गूजर आंदलोन

फिर 3 सितंबर 2006 में बैंसला तब चर्चा में आये जब उनके समर्थको ने करौली के हिण्डोन क़सबे में दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग को पहली बार जाम किया.

ये आंदोलन तब से किसी ना किसी रूप में चल ही रहा है. इस आंदोलन में हिंसा की वजह से अब तक 72 लोग जान गंवा चुके हैं.

बार-बार रेल और सड़कें रोकने के कारण बैंसला की खूब आलोचना होती रही है. हाल ही में राजनैतिक तौर प्रभावशाली जाट महासभा ने कहा है कि वे अपने लोगों को गुमराह कर रहे है.

आंदोलन के दौरान आम नागरिकों के प्रभावित होने के मामले में अदालत ने भी बैसंला से सफ़ाई मांगी है पर बैंसला और उनके समर्थक डटे हुए हैं.

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