क्या धर्म का प्रचार धर्मांतरण से अलग है?

धर्मांतरण
    • Author, मनोज मिट्टा
    • पदनाम, लेखक और क़ानूनी मामलों के पत्रकार
  • प्रकाशित

संविधान निर्माताओं ने सभी धार्मिक समुदायों को अपने धर्म के प्रचार की छूट दी थी. इसे 'अल्पसंख्यकों को दी गई रियायतों' के तौर पर देखा गया और दो दशक तक चीज़ें सामान्य रहीं.

'अल्पसंख्यकों को दी गई रियायतों' में दो दशक के बाद उस वक़्त खलल पड़ी जब दलितों और आदिवासियों की बड़ी आबादी वाले उड़ीसा में धर्मांतरण विरोधी क़ानून लाया गया.

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1960 के दशक में स्वतंत्र पार्टी की सरकार 'दी फ्रीडम ऑफ़ रिलीजन एक्ट, 1967' लाई थी. इसमें जबरन, लालच या किसी तरह के छल से धर्मांतरण कराने पर रोक का प्रावधान था.

इस क़ानून में 'प्रलोभन' शब्द की परिभाषा बेहद विवादास्पद थी क्योंकि इसके दायरे में 'किसी भी तरह से पहुंचाए गए फ़ायदे, चाहे वह नगदी हो या फिर किसी अन्य स्वरूप में हो' को लाया गया था.

प्रलोभन या लालच

धर्मांतरण

इसका एक मतलब ये भी था कि अगर कोई दलित आत्मसम्मान और बराबरी के लिए हिंदू धर्म का त्याग करता है तो उसके धर्मांतरण को प्रलोभन के आधार पर चुनौती दी जा सकती थी.

इसमें कोई हैरत की बात नहीं थी कि 1972 में जब उड़ीसा हाई कोर्ट ने 1967 के इस क़ानून को असंवैधानिक करार देने के जो कारण गिनाए थे, उनमें 'प्रलोभन' शब्द की 'अस्पष्ट' परिभाषा भी एक वजह थी.

साल 1968 में मध्यप्रदेश में भी संयुक्त विधायक दल की सरकार ने ऐसा ही एक क़ानून बनाया जिसमें 'प्रलोभन' की जगह 'लालच' शब्द का जिक्र किया गया.

भारत का सुप्रीम कोर्ट

इस क़ानून के तहत प्रत्येक धर्मांतरण की 'सूचना' ज़िलाधिकारी को देना ज़रूरी कर दिया गया.

साल 1974 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस क़ानून को दी गई चुनौती को खारिज़ करते हुए कहा कि वे उड़ीसा हाई कोर्ट के 'फ़ैसले के आधार से इत्तेफाक़ नहीं रखते' हैं.

इसके ठीक बाद सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की एक संविधान पीठ ने दोनों उच्च न्यायालयों के फ़ैसलों के ख़िलाफ़ दायर की गई याचिकाओं पर इकट्ठी सुनवाई शुरू कर की.

संविधान सभा

सरदार पटेल, पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी

जनवरी, 1977 में दिए गए फ़ैसले में संविधान पीठ ने एकमत से धर्मांतरण विरोधी दोनों ही क़ानूनों को बरकरार रखा लेकिन उड़ीसा हाई कोर्ट की दलील पर कुछ कहने से वह साफ तौर पर बचती दिखी और उसने संविधान सभा की बहसों को भी नजरअंदाज कर दिया.

फ़ैसले में 'प्रचार' के बारे में कहा गया कि यह किसी को अपने धर्म में शामिल करने का अधिकार नहीं है.

धर्मांतरण

और इसकी वजह बताई गई, "अगर कोई व्यक्ति जान बूझकर धर्मांतरण करता है तो यह सभी नागरिकों को दिए गए अंतरात्मा की स्वतंत्रता के अधिकार का अतिक्रमण होगा."

मुसलमानों और इसाईयों को हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए जो अभियान जोर शोर से चलाया जा रहा है, उसके मद्देनज़र सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले और इसी मुद्दे पर बने आधा दर्जन से अधिक राज्यों के क़ानूनों को फिर से देखे जाने की ज़रूरत है.

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