लेस्बियन शृंखलाः बेटियों का 'प्यार' स्वीकार

समलैंगिक, लेस्बियन, महिला, एलजीबीटी
    • Author, माया शर्मा
    • पदनाम, लेखक और शोधकर्ता, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

भारत में समलैंगिकता को लेकर लोगों की सोच बदल रही है. कुछ साल पहले तक इन मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से बात करने से भी बचा जाता था.

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यह बदलाव केवल महानगरों तक सीमित नहीं हैं. दूर-दराज के गाँवों में भी कई बार इन मुद्दों पर आश्चर्यजनक समझदारी नज़र आती है.

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कुछ लड़कियों को उनके घरवालों को इस मामले में अभूतपूर्व सहयोग मिला. और ऐसी लड़कियाँ गुज़ार रही हैं ख़ुशहाल जीवन.

पढ़ें लेस्बियन शृंखला की तीसरी कहानी

लेस्बियन, समलैंगिक, महिलाओं के पैर

1996 में समलैंगिकता पर आधारित फिल्म 'फ़ायर' पर बैन लगा. इस मुद्दे को लेकर काम कर रहे हम जैसे लोगों के लिए भी सड़कों पर आकर खुलेआम ये कहना कि औरतों के आपसी प्यार को दिखाती इस फिल्म पर लगे बैन के हम ख़िलाफ़ हैं, बहुत बड़ी बात थी.

लेस्बियन शब्द जो उस समय केवल बुदबुदाया जाता था, उसे पोस्टर पर छाप कर बीच-बाज़ार में खड़े रहना उन दिनों बहुत बड़ी बात थी.

साल 2014 में उन दिनों के बारे में सोचती हूं तो लगता है कि अब कितना कुछ बदल गया है.

लेस्बियन शब्द के साथ कितनी और पहचानों से हम परिचित होते गए हैं, जो स्त्री पुरुष के संबंधों, शादी और प्रजनन के दायरे से बाहर मौजूद हैं.

हैरान करने वाली समझदारी

लेस्बियन युगल

साल 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय से दो पुरुषों या दो महिलाओं के आपसी प्यार को अपराधीकरण से मुक्त किया और 2013 में सुप्रीम कोर्ट इन संबंधों को एक बार फिर आपराधिक करार दे दिया.

लेकिन शहरों से बाहर दूर-दराज़ गांवों में आज इन संबंधों को लेकर जितनी चर्चा और समझदारी है वो महानगरों को हैरान कर देने के लिए काफ़ी है.

दूर-दराज़ गांवों में भले ही इन संबंधों पर चुप्पी हो लेकिन ये चुप्पियां शहरों और महानगरों की भाषा से अलग कुछ कहती हैं.

कहीं-कहीं पर औरतें जो औरतों को प्यार करती हैं उन्हें रंगली कहा जाता है. जो स्त्रियां पुरुष रूप अपना कर रहती हैं उन्हें भाई, बाबू और काका के नाम से पहचाना जाता है.

ऐसी कई औरतों से अपने शोध और इससे जुड़े काम के दौरान मिली हूं.

मियाँ-बीवी की जोड़ी

लेस्बियन, परेड

मसलन दो औरतें जो रोज़ी-रोटी के लिए गांव से पलायन कर शहर आईं. इनमें से एक शादीशुदा थी और शायद अपने पति से कुछ नाखुश. दूसरी का तलाक हो चुका था.

पेशे से होमगार्ड ये महिलाएं काम की जगह मिलीं. दोस्ती बढ़ती गई और समय के साथ लोगों ने इन्हें मियाँ-बीवी की जोड़ी का नाम दे दिया.

एक साइकिल चलाती दूसरी उसके पीछे बैठती. शहर की आज़ादी उन्हें उस रिश्ते को निभाने की जगह देती थी जिसे समाज और उनके अपने परिजन न कभी समझ पाए न समझने की कोशिश की.

जब मैंने इनके चर्चित नाम का हवाला देकर उनसे उनके रिश्ते के बारे में जानना चाहा तो वो मुस्कुरा भर दीं.

गांव के परिवेश में कभी-कभी यह संबंध परंपराओं के रंग में यूं रंगे रहते हैं कि हम फ़र्क देख ही नहीं सकते.

पुरुष का रूप

लेस्बियन, समलैंगिक

एक आदिवासी इलाक़े में दो औरतों ने शादी कर ली. इनमें से एक 'माताजी' के नाम से मशहूर थी, लेकिन वो एक पुरुष के रुप में रहती थीं.

गांव उन्हें देवी का रूप मानता था. रोज़ाना पूजा-पाठ से मिली अपनी इस पहचान और शरीर से बेशक स्त्री होने के बावजूद स्वेच्छा से दैनिक जीवन में उन्होंने पुरुष रूप अपनाया हुआ था.

महीने में एक बार पूनम की रात में ‘देवी’ के हुक्म से ‘माताजी’ चुनरी और कड़े पहनकर स्त्री रूप धारण कर भक्तों के दुख दर्द बांटती थीं, और पूरे गांव ने इस रूप में उन्हें स्वीकार कर लिया.

यहां तक कि पूनम की रात श्रद्धालुओं की उमड़ती भीड़ के लिए पकाना, परोसना, उनकी अपनी देखभाल करना और साथ में मंदिर में यथायोग्य विधि-विधान से पूजा करने के लिए उन्होंने एक महिला के साथ विवाह भी कर लिया.

ऐसा नहीं था कि सौ से ज़्यादा लोगों के बीच संपन्न हुए इस विवाह को लेकर कुलबुलाहट नहीं हुई. पर यह नहीं सुनाई दिया कि उन्हें गांव से बाहर निकाला हो या उनके साथ उठना-बैठना बंद कर दिया हो.

मंदिर की घंटियाँ आज भी दूर-दूर तक सुनाई देती हैं.

शहर से अलग गाँव

समलैंगिक, लेस्बियन

समलैंगिकता के मुद्दे पर काम करते हुए मैंने ये समझा है कि इसी मायने में गांव शहरों से काफ़ी हद तक अलग हैं.

एक अन्य मामले में जो हुआ वो मुझे शायद ही कभी भूलेगा.

राजस्थान के एक सुदूर बीहड़ इलाके में भारवाड़ समुदाय के एक पिता ने अपनी बेटी को पढ़ने-लिखने एक स्कूल में दाखिल कराया. ये वो समुदाय है जहां लड़कियों को शायद ही कभी पढ़ने-लिखने का मौका दिया जाता हो.

एक दिन पिता को स्कूल से शिकायत मिली कि उनकी बेटी स्कूल में दूसरी लड़कियों को प्रेम-पत्र लिखती है. पिता ने चुप रहते हुए बस इतना भर कहा कि उसे स्कूल से न निकालें बाकि चाहे जो सलूक करें.

एक हफ़्ते तक उस लड़की को प्रिसिंपल के कमरे के बाहर खड़ा रखा गया. अब तक लिफ़ाफ़े में बंद प्यार की बात चारों तरफ घूम गई.

लेकिन उस दिन के बाद जब वो लड़की क्लासरूम में पहुंची तो उसे अपनी डेस्क में कई प्रेम पत्र मिले.

पिता ने किया स्वीकार

लेस्बियन, समलैंगिक

ज़ाहिर है उस छोटी सी सुदूर दुनिया में भी कुछ और ऐसी लड़कियां थीं जो अपने साथी की तलाश करना चाहती थीं.

गांव से निकलकर ये लड़की आज शहर में नौकरी कर रही है. शादी भले ही न कर सकी हो लेकिन अपनी महिला साथी के साथ खुश है.

पिता ने अपनी बेटी की तरक्की और चुनाव दोनों को स्वीकार कर लिया है.

मेरे मन में कई बार ये सवाल उठता है कि शहर के जड़ हो चुके मध्यवर्गीय परिवेश में क्या ये संभव था?

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