'हम तबीयत से तमाशबीन हैं'

पूजा, आरती, राजेश कुमार
    • Author, समैंथी दिसानायके
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़
  • प्रकाशित

भारत में एक सरकारी बस में 'छेड़खानी' कर रहे दो आदमियों की पिटाई करती हुई दो लड़कियों का वीडियो वायरल हो गया है.

दोनों को सोशल मीडिया पर ढेरों शाबाशियाँ मिलीं और 24 घंटे के भीतर वो सेलेब्रिटी बन गईं.

समाज के अलग-अलग तबके के पेशवर लोगों से हमने ये जानने की कोशिश की कि इस वीडियो को लेकर इतना आवेश आख़िर क्यों फैला.

हक़ीकत तो ये है कि ऐसी घटनाएं हमारे आसपास जब होती हैं तब हम तमाशबीन बने रहते हैं.

बस के अंदर से हुआ शूट

रोहतक, पूजा, आरती

इस वीडियो का पर्सपेक्टिव आपको सीधे बस के अंदर ले जाता है जैसे आप भी अंदर मौजूद एक तमाशबीन हों. वीडियो में दो बहनें कथित छेड़खानी करने वालों को पीट रही हैं.

मुंबई विश्वविद्यालय में मास मीडिया के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हनीफ लकड़ावाला कहते हैं, "अचानक आप स्क्रीन पर वो होते देखते हैं जो कि आम जीवन में रोज़ ही होता है."

वो कहते हैं, "इस तरह का अपमान रोज़ झेलने वाली महिलाएँ इस वीडियो को देख रही हैं. उनके माता-पिता इसको देख रहे हैं."

'आसपास रोज़ होता है'

पीड़ित महिला

लड़कियों के साथ छेड़खानी भारत में एक आम घटना है. अलीशा शर्मा और उनकी चार साथी छात्रों ने कुछ साल पहले 'चप्पल मारूँगी' कैंपेन चलाया था ताकि खुलकर ऐसी हरकतों का विरोध कर सकें.

अलीशा कहती हैं, "यह हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है. हम इससे बच नहीं सकते. भीड़ भरी जगहों, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे इत्यादि जगहों पर यह अक्सर होता है."

वो कहती हैं, "अगर मैं अपनी आवाज़ उठाऊँगी तो मेरे आसपास के लोग मदद करेंगे. अगर आप ख़ुद के लिए आवाज़ नहीं उठाएंगी तो दूसरा कोई भी नहीं उठाएगा."

हालांकि इस कैंपेन में चप्पल को प्रतीक के रूप में प्रयोग किया गया है. अलीशा कहती हैं कि यह केवल प्रतिरोध का प्रतीक है, न कि हिंसा का.

साल 2012 में दिल्ली में चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद भारत में जेंडर का मुद्दा ख़ासा उठा है.

शोषण का पलटा पासा

स्टॉप एब्यूज़, आदमी

महिला अधिकार कार्यकर्ता कविता कृष्णन कहती हैं, "इससे यह भी पता चलता है कि किसी घटना के बाद मौके पर ही न्याय हो जाने की भावना से लोग कितने रोमांचित होते हैं."

वो कहती हैं, "मुझे लगता है कि इन लड़कियों ने जबरदस्त साहस दिखाया है. हम सबको घटनास्थल पर ही प्रतिक्रिया देने का अनुभव है. मुझे लगता है कि यह बहुत ही आम बात है और ऐसा केवल भारत में नहीं होता."

कविता दुनिया भर की महिलाओं को स्टीग लार्सन की मिलेनियम सिरीज़ की किताबों से मिल रही संतुष्टि की तरफ़ ध्यान दिलाती हैं. लार्सन की किताबों पर हॉलिवुड में फ़िल्में बन चुकी हैं.

इन किताबों में एक ऐसी महिला की कहानी है जो आम धारणा के उलट, सफलतापूर्वक मुंहतोड़ जवाब देना जानती है.

मदद को कोई नहीं आया

अवसादग्रस्त महिला

बीबीसी हिन्दी की रूपा झा कहती हैं कि यह वीडियो एक तरह से आपकी आशंकाओं-पूर्वानुमानों को पुष्ट करता है.

ख़ुद ऐसे अनुभवों से गुज़र चुकीं रूपा कहती हैं, "आज से बीस साल पहले भी ऐसा ही होता था....कोई कुछ नहीं बोलता."

वो बताती हैं, "मैं बस से घर वापस आ रही थी. शाम होने ही वाली थी. दिल्ली की एक बहुत व्यस्त सड़क पर मैं उतरी. बहुत ही संभ्रांत ढंग से इंग्लिश बोल रहा एक नौजवान मुझसे कुछ कह रहा था. जब मैं थोड़ा और नज़दीक पहुँची तो मुझे पता चला कि वो क्या कह रहा है....वो मुझसे पूछ रहा था - 'तुम्हें पता है कि इजैकुलेशन क्या होता है?', वो बार-बार यही सवाल पूछ रहा था."

रूपा याद करते हुए कहती हैं, "यह बेहद डरावना और ग़ुस्सा दिलाने वाला अनुभव था."

वो कहती हैं, "मैंने उसे थप्पड़ मारा, फिर उसने भी मुझे थप्पड़ मारा. मैंने उसका कॉलर पकड़ लिया. जब यह शुरू हुआ तो वहाँ पचासों लोग थे लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया. मैं उसे मार रही थी और वो मुझे मार रहा था."

रूपा बताती हैं कि उन्हें अंत में पुलिस को बुलाना पड़ा.

कुछ तो गड़बड़ है

बलात्कार विरोधी प्रदर्शन

इन घटनाओं से पता चलता है कि हमारा समाज ऐसी स्थितियों में कुछ नहीं करता.

कविता कृष्णन कहती हैं, "हम जितनी सहजता से मुस्तैदी से दिए गए इस जवाब की तारीफ़ कर रहे हैं उससे पता चलता है कि हमारा समाज रोज़मर्रा के जीवन में महिलाओं की स्वायत्ता को स्वीकार करने में कितना असहज है."

कविता मानती हैं कि इससे हमारे समाज की सामाजिक और सांस्थागत प्रक्रिया की विफलता का पता चलता है. उन लड़कियों को मारपीट का सहारा लेना पड़ा इससे पता चलता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है.

वो कहती हैं, "मैं उनमें से नहीं हूँ जो इस तरह की चौकन्नी कार्रवाई को लेकर सहज हो, ख़ासकर तब जब महिलाएँ ही ख़ुद के लिए कुछ न कर रही हों."

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