विशेष राज्य का दर्जा मांगने वाले बिहार की हक़ीकत

नीतीश कुमार धरना
    • Author, मनीष शांडिल्य
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दो मार्च को सड़क पर उतरे थे. मौक़ा था उनकी पार्टी के बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को तेज़ करने के लिए बिहार बंद का आह्वान.

तब अरविंद केजरीवाल और किरण कुमार रेड्डी के बाद नीतीश कुमार दो महीने से भी कम समय के अंदर केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ सड़क पर उतरने वाले तीसरे मुख्यमंत्री बने थे. बंद के मौके पर पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में एक दिवसीय धरने का भी आयोजन किया गया था.

इस कार्यक्रम में नीतीश कुमार ने विशेष राज्य का दर्जा मिलने से होने वाले फ़ायदों के बारे में विस्तार से जानकारी दी थी.

उन्होंने बताया था कि अगर ऐसा हुआ तो राज्य के अपने संसाधन बचेंगे और केंद्र से पहले के मुक़ाबले ज़्यादा राशि मिलेगी.

कैग रिपोर्ट

लेकिन एक तरफ बिहार सरकार राज्य के विकास के लिए विशेष राज्य के रूप में केंद्र से ज़्यादा राशि की मांग कर रही है तो दूसरी ओर भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी कैग की हालिया रिपोर्ट बताती है कि बिहार सरकार अपने पास उपलब्ध राशि का लगभग एक चौथाई हिस्सा ख़र्च ही नहीं कर पा रही है.

वित्तीय वर्ष 2012-13 के 'राज्य का वित्त' पर कैग की रिपोर्ट पिछले महीने बिहार विधानसभा में पेश की गई.

इसके अनुसार 2012-13 के दौरान बिहार सरकार के पास 51 अनुदान और विनियोग के विरुद्ध कुल 93,613.52 करोड़ रुपए की राशि उपलब्ध थी.

लेकिन सरकार इसमें से केवल 70,469.15 करोड़ रुपए ही ख़र्च कर पाई. इस तरह बिहार सरकार 23,144.37 करोड़ रुपए की बहुत बड़ी राशि ख़र्च ही नहीं कर पाई जो उपलब्ध राशि के एक चौथाई से थोड़ा ही कम है.

नीतीश कुमार धरना

इस रिपोर्ट के आईने में एक बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि पिछले आठ साल से विशेष राज्य के दर्जे की मांग करने के बावजूद सरकार क्या वित्तीय प्रबंधन के लिहाज से ख़ुद को इसके तैयार कर पाई है?

स्वायत्तता और निगरानी

अर्थशास्त्री और रघुराजन कमेटी में बिहार का प्रतिनिधित्त्व करने वाले शैबाल गुप्ता के अनुसार राज्य को विकास के लिए ज़्यादा पैसे मिले इसकी लड़ाई अलग है और उपलब्ध राशि पूरी ख़र्च हो यह चुनौती अलग है. दोनों के बीच कोई विरोधाभास नहीं है.

शैबाल की राय में वर्तमान में सरकार अगर उपलब्ध राशि का 75 प्रतिशत ख़र्च कर पा रही है तो यह भी अपने आप में बड़ी उपलब्धि है. पहले की सरकारें इतना भी ख़र्च नहीं कर पाती थीं. हालांकि उनका भी मानना कि इस क्षमता को और बढ़ाए और बेहतर किए जाने की ज़रूरत है.

दूसरी ओर अर्थशास्त्री और कंट्री कंसल्टेंट के रूप में विश्व बैंक को अपनी सेवाएं दे चुके शशिभूषण मानते हैं कि राज्य में वित्तीय अनुशासन नहीं है. उनके अनुसार हाल के वर्षों में राज्य सरकार ने ऐसा कोई ब्लू-प्रिंट पेश नहीं किया है जिसमें उसने ज़्यादा राशि मिलने पर उसके ख़र्च की रूप-रेखा पेश की हो.

उनके अनुसार राज्य अपने पास उपलब्ध राशि पूरी तरह ख़र्च कर पाए इसके लिए ज़रूरी है कि सरकार वित्त विभाग को और स्वायत्तता दे. लेकिन नीतीश कुमार के कार्यकाल में भी यह स्वायत्तता अब तक नहीं मिल पाई है.

राशि खर्च हो इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि समय पर विभिन्न योजनाओं के लिए राशि आवंटित की जाए और हर महीने ख़र्च की निगरानी भी की जाए.

शशिभूषण बताते हैं कि हाल के वर्षों में कुछ राज्यों ने वित्तीय प्रबंधन के क्षेत्र में यह पहल की है कि हर महीने संबंधित योजना राशि का लगभग आठ प्रतिशत ख़र्च हो और हर तिमाही में इसकी समीक्षा कर इसे समायोजित भी किया जाए.

बेहतर प्रबंधन ज़रूरी

कैग रिपोर्ट के बहाने अर्थशास्त्री राज्य की वित्तीय सेहत पर अलग-अलग राय सामने रख रहे हैं. ऐसे में सहज ही यह भी सवाल खड़ा होता है कि वित्तीय मोर्च पर ऐसी तैयारी के मद्देनज़र क्या बिहार को विशेष राज्य के दर्जे की मांग छोड़ देनी चाहिए? क्या बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए?

नीतीश कुमार धरना

शैबाल गुप्ता कहते हैं कि आप पैसे ख़र्च नहीं कर पा रहे हैं इस कारण आपको ज़्यादा राशि नहीं मिले, यह कोई तर्क नहीं है. राशि ख़र्च करने की क्षमता प्रशासनिक क्षमता से जुड़ा हिस्सा है और ज़्यादा राशि मिलने से ही यह क्षमता बढ़ती है.

वहीं इस सबंध में राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन का कहना है कि बिहार जैसे ऐतिहासिक रूप से ग़रीब और पिछड़े राज्य को विशेष राज्य दर्जा, आर्थिक पैकेज, ऋण में छूट जैसी जो भी सहायता मिले उसकी मांग लगातार की जानी चाहिए.

लेकिन साथ-साथ यह भी ज़रूरी है कि राज्य सरकार पहले उपलब्ध राशि को संभालने लायक, ख़र्च करने लायक बने और इसके लिए अपने वित्तीय प्रबंधन और बजटीय नियंत्रण पर ध्यान दें.

ऐसी ही कई अनुशंसाएं कैग ने अपनी रिपोर्ट में भी की हैं जिन पर सरकार को तुरंत ध्यान देना चाहिए.

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