क्या जयललिता बन पाएंगी किंगमेकर?

    • Author, मधुकर उपाध्याय
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

महाभारत कथाओं और अंतर्कथाओं की संभवत: सबसे ज़रख़ेज़ ज़मीन है. कहते हैं कि जो था, है और होगा, वहां पहले से मौजूद है.

असंख्य पात्र, अनगिनत घटनाक्रम, अकल्पनीय नाटकीयता. और ये सब भी इतना तरल कि मौक़ा-इत्तेफ़ाक़ देखकर नई शक्ल अख़्तियार कर ले, आज के हिसाब से मौज़ूं हो जाए. लोकतंत्र जैसी स्थितियों में भी, जिसकी कल्पना भी तब नहीं रही होगी.

इतनी विविधता के बावजूद एक संदेश महाभारत में बार-बार आता है. हर बार कुछ नए पात्रों और नई कथा के साथ- यह कि हम इच्छा कर सकते हैं, प्रयास कर सकते हैं और परिणाम सुनिश्चित करने के लिए कठोरतम और निर्ममतम क़दम उठा सकते हैं, लेकिन अंतत: जो होता है वह हमारे हाथ में नहीं होता. किसी और के हाथ में होता है.

भारी भरकम ताले की छुटंकी-सी चाबी किसी अज्ञात कुलशील के पास पहुंच जाती है.

कुछ ऐसा ही फिर होने जा रहा है. आम चुनाव सिर पर हों, तो काशी की तीन कन्याओं अंबा, अंबिका, अंबालिका या शांतनु और सत्यवती की तीन हस्तिनापुर संतानों भीष्म, चित्रांगद, विचित्रवीर्य की कथा कौन सुनेगा.

लेकिन इसमें से नियोग हटा दीजिए तब भी विचित्रवीर्य की विचित्रवीणा के स्वर निरर्थक नहीं होते. क्योंकि तबसे आज तक अंत में सवाल एक ही बचता है कि हस्तिनापुर की गद्दी पर कौन बैठेगा?

सिंहासन तक का सफ़र

राज प्रासाद की चाबी किसके पास होगी? वो इसकी क्या क़ीमत वसूल करेगा? चाबी देगा तो क्या उसका मालिकाना हक़ भी सौंप देगा? कितने कहार पालकी उठाएंगे? कोई बीच में कंधा तो नहीं बदल लेगा? और अगर बदला तो दूसरा कंधा कौन सा होगा? या, कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि पालकी सिंहासन तक पहुंचे ही नहीं?

अगले साठ-सत्तर दिन चलने वाली भुवनेश्वर सरीखी इस एकांकी के दृश्य धीरे धीरे हमारे सामने खुलेंगे. अंक वही रहेगा, यानी कि 2014. लीजिए आप भी देखिए, इस एकांकी का पहला दृश्य.

स्थान- चेन्नई, पोएस गार्डेन, मुख्य पात्र- जे. जयललिता.

तमाम फ़िल्मों में एमजी रामचंद्रन की नायिका रह चुकीं तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के लिए न यह पटकथा नई है और न ही उनकी यह इच्छा कि एक बार इंद्रप्रस्थ पहुंच जाएं.

जयललिता पोस्टर

दिक़्क़त ये है कि अपने राज्य की सीमा के बाहर वे तो मौजूद हैं लेकिन उनकी पार्टी नहीं है. उसके होने की संभावना भी शून्य है.

ऐसे में उनकी ताक़त और चाबी हथिया लेने की सलाहियत तभी हो सकती है जब वे अपने सांसदों का आंकड़ा तीस से पार ले जाएं.

पुडुचेरी को जोड़ लें तो तमिलनाडु उन पांच राज्यों में आता है जहां से किसी राजनीतिक दल को चालीस लोकसभा सीटें मिल सकती हैं. बाक़ी के राज्य हैं- उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र.

जयललिता का दावा

पिछले चुनाव तक आंध्र प्रदेश भी इस श्रेणी में था, पर इस बार तेलंगाना की 17 सीटें हटने के बाद शायद नहीं रहेगा.

जयललिता की समस्या यह है कि करुणानिधि की डीएमके संसद के मामले में हर बार उनकी राह का रोड़ा बन जाती है. तमिलनाडु विधानसभा में जैसे परिणाम अन्नाद्रमुक या द्रमुक के पक्ष में आते हैं, लोकसभा में नहीं आते.

वहां तक आते-आते खेल बिगड़ जाता है. क्योंकि तमिलनाडु में कुछ छोटी सियासी जमातों के अलावा कांग्रेस पार्टी भी भूशून्य नहीं हुई है. कुल मिलाकर वहां का खेल पूरी तरह खुला हुआ है.

तमिल पोस्टरों में जयललिता को अभी से 'प्रधानमंत्री पुरात्ची थलेवी अम्मा डॉक्टर जे. जयललिता' लिखा जाने लगा है. इनमें बड़े-बड़े विश्व नेता उनके सामने अदब से सिर झुका कर खड़े दिखाए जाते हैं. श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे तो घुटने टेके बैठे हैं. नीचे लिखा रहता है- प्रधानमंत्री ऐसा होना चाहिए. अम्मा के अलावा ऐसा और कौन हो सकता है?

क्षेत्रीयता का मुद्दा

ये पोस्टर तमिलनाडु में चर्चा में हैं, जिसमें अगर आलोचना है तो मूक सहमति भी है. इस महिमामंडन के बावजूद अन्नाद्रमुक को तमिलनाडु से आज तक किसी चुनाव में 18 से ज़्यादा सांसद नहीं मिले हैं. पिछले आम चुनाव में तो केवल नौ ही मिले थे.

जयललिता को अगर वाक़ई इंद्रप्रस्थ की चाबी हासिल करनी है तो उन्हें अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से दोगुना बेहतर परिणाम सुनिश्चित करना होगा. मतलब कम से कम 35-36 सीटें. ये एवरेस्ट की चढ़ाई से कम मुश्किल नहीं है.

जयललिता इतनी ही सीटों पर चुनाव लड़ भी रही हैं. बाक़ी उन्होंने अपने सहयोगी दलों के लिए छोड़ रखी हैं. गो कि यह आंकड़ा आसान नहीं होगा, जयललिता के लिए इससे कम के विकल्प का कोई अर्थ भी नहीं है.

उनकी पहली चुनौती अगर करुणानिधि हैं, तो दूसरी, तीसरी, चौथी और पांचवीं चुनौती ममता बनर्जी, मुलायम सिंह यादव, मायवती और नीतीश कुमार हैं. इनमें से कोई भी उनके बराबर या उनसे अधिक सीटें ला सकता है.

तमिलनाडु में यह माना जा रहा है कि दरअस्ल इस बार चुनावी नतीजे पहले से बेहद अलग होंगे क्योंकि इस दफ़ा क्षेत्रीयता सबसे बड़ा मुद्दा होगी.

दोस्ती नहीं दुश्मनी भली

गुजरात गौरव, बंगाल गौरव की तरह तमिलनाडु गौरव चुनाव में बड़ी भूमिका निभाएगा क्योंकि जनता किसी क्षेत्रीय दल के लिए नहीं बल्कि अपने राज्य के संभावित प्रधानमंत्री के लिए भी वोट डालेगी.

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीयता इस बार, ख़ासकर पांच बड़े राज्यों में, विकास और सांप्रदायिकता पर भारी पड़ेगी. जातीय समीकरण भी क्षेत्रीयता के सामने हल्के पड़ जाएंगे.

गुजरात के मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी से अपनी कथित निकटता को जयललिता ने धीरे धीरे अभेद्य दूरी में तब्दील कर लिया है.

भाजपा वैसे भी अटल बिहारी वाजपेयी के अनुभव के बाद उन्हें लेकर बहुत आश्वस्त नहीं थी. 1998 में सालभर के अंदर उन्होंने वाजपेयी सरकार को झटका दे दिया था.

सन 2004 में भी इसी की पुनरावृति हुई. ये तो 2014 है और इस बार जयललिता अपने पांसे अलग से फेंक रही हैं.

राजनीतिक समीकरणों में बहुत अधिक यक़ीन न रखने वाली जयललिता इस मामले में क़रीब-क़रीब ''कुख्यात' हैं कि उनसे दोस्ती करने से बेहतर दुश्मनी करना है. कम से कम आप आश्वस्त होंगे कि सामने वाला वार करेगा ही.

अम्मा के समर्थक कहते हैं यह कुख्याति राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर जयललिता को फ़ायदा पहुंचाएगी. अगर ऐसा हुआ तो उन्हें सत्ता मिल भी सकती है, जैसे विचित्रवीर्य को हस्तिनापुर में मिली थी, बिना चाहे.

सत्ता नहीं भी मिली तो कम से कम उसकी चाभी ज़रूर जयललिता के हाथ आ जाएगी. 66 साल की उम्र में ये भी कम नहीं है.

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