जंतर मंतर प्रोटेस्टः प्रदर्शनकारियों पर फ़ेशियल रिकॉग्निशन तकनीक से कैसे रखी जा रही थी नज़र - बीबीसी पड़ताल

- Author, नायला ख़्वाजा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
20 जुलाई को दिल्ली के जंतर मंतर पर हज़ारों लोग प्रदर्शन के लिए जमा हुए थे. इसी दौरान एक पत्रकार ने पुलिस की निगरानी व्यवस्था में कुछ ऐसा देखा, जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी.
एक खोजी पत्रकार सृष्टि जायसवाल जंतर मंतर पर रिपोर्टिंग कर रही थीं. प्रदर्शन स्थल की तस्वीरें और वीडियो बनाते हुए जब उन्होंने वहां खड़ी एक सर्विलांस वैन को ज़ूम किया, तो वैन के अंदर लगे मॉनिटर पर उन्हें अपना ही चेहरा दिखाई दिया.
सृष्टि के मुताबिक़, कैमरा उनके चेहरे पर ज़ूम इन और ज़ूम आउट कर रहा था.
वो कहती हैं, "मुझे एक सेकंड लगा खुद को पहचानने में. फिर मुझे लगा, ओह माय गॉड, ये तो मैं हूं."
उनका कहना है कि उन्होंने वैन के अंदर कई स्क्रीन पर अलग-अलग तरह की निग़रानी होते देखी. उन्होंने वैन के अंदर मौजूद अधिकारी से इस बारे में पूछा.
अधिकारी ने सिर्फ इतना बताया कि वहां पीटीज़ेड कैमरे लगे हैं, जो अपने आप ज़ूम करते हैं. जब उन्होंने दोबारा सवाल किया, तो वैन का दरवाज़ा बंद कर दिया गया.
जंतर मंतर पर उस दिन सिर्फ़ सर्विलांस वैन ही नहीं थीं. वहां सीसीटीवी कैमरे, ड्रोन और पुलिस के फ़ोटोग्राफ़र भी मौजूद थे.
एक दूसरी पत्रकार इला काज़मी ने भी एक सर्विलांस वैन की तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड किए. उनके मुताबिक़, वैन पर 'लाइव फ़ेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम' लिखा हुआ था.
उनके वीडियो में प्रदर्शनकारियों की रिकॉर्डिंग के साथ तस्वीरें और नाम दिखाई देते हैं. उनके मुताबिक़, कुछ स्क्रीन पर चेहरे की तस्वीर के साथ 'मैच सिमिलैरिटीज़' और उसका प्रतिशत भी दिखाई देता है.
कैमरा चेहरा कैसे पहचानता है?

फ़ेशियल रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी को सरल शब्दों में समझें तो कैमरा पहले किसी शख़्स के चेहरे की तस्वीर कैप्चर करता है. सॉफ़्टवेयर उस चेहरे की एक डिज़िटल कॉपी तैयार करता है और फिर उसे किसी डेटाबेस में मौजूद तस्वीरों से मिलाने की कोशिश करता है.
लेकिन जंतर मंतर पर इस्तेमाल की गई व्यवस्था में वास्तव में किस सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल हुआ और किस डेटाबेस से चेहरों का मिलान किया गया, यह सवाल अब भी साफ़ नहीं है.
पत्रकार सृष्टि और कौशिक राज ने अपनी रिपोर्टिंग के लिए इस मुद्दे पर दिल्ली पुलिस से सवाल किए थे.
उनके मुताबिक़, "पुलिस से पूछा गया था कि सर्विलांस वैन में कौन-सी तकनीक इस्तेमाल हो रही है, रिकॉर्ड किए गए लोगों का डेटा कहां रखा जाता है और उसका आगे क्या किया जाता है."
उन्हें इन सवालों का जवाब नहीं मिला.
डिज़िटल राइट्स रिसर्चर दिशा वर्मा भी कहती हैं कि फ़ेशियल रिकग्निशन सिस्टम में सबसे बड़ी समस्याओं में से एक इसकी अपारदर्शिता है.
उनके मुताबिक़, यह साफ़ नहीं है कि पुलिस किसी शख़्स की पहचान के लिए किस डेटाबेस का इस्तेमाल करती है.
वो सवाल उठाती हैं कि अगर डेटाबेस स्थानीय है तो दूसरे राज्यों से आए प्रदर्शनकारियों की पहचान कैसे होगी? और अगर राष्ट्रीय स्तर का डेटाबेस इस्तेमाल हो रहा है तो उसमें ग़लत मिलान की संभावना का सवाल और बड़ा हो जाता है.
यह तकनीक अचानक नहीं आई

जंतर मंतर पर दिखी निग़रानी व्यवस्था को समझने के लिए हमने सरकारी दस्तावेज़ों, आरटीआई जवाबों, अदालत के रिकॉर्ड और पुरानी रिपोर्टिंग का भी अध्ययन किया.
भारत में पुलिसिंग में फ़ेशियल रिकॉग्निशन का इस्तेमाल पिछले कुछ सालों में बढ़ा है.
साल 2019 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने नेशनल ऑटोमेटेड फ़ेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम (एएफ़सीएस) के लिए टेंडर जारी किया था.
इसका मक़सद क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों को फ़ेशियल रिकॉग्निशन की ऐसी व्यवस्था उपलब्ध कराना था, जिससे तस्वीरों के ज़रिए पहचान में मदद मिल सके.
2020 में संसद में सरकार ने भी एएफ़सीएस के बारे में जानकारी दी थी.
सरकार के मुताबिक़, इसका इस्तेमाल अपराधियों, अज्ञात शवों और लापता या मिले हुए लोगों की पहचान में मदद के लिए किया जाना था.
पिछले एक दशक में शहरों में निगरानी का बुनियादी ढाँचा भी बढ़ा.
स्मार्ट सिटीज़ मिशन के तहत बनाए गए इंट्रीगेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर्स (आईसीसीसी) में शहरों के अलग-अलग कैमरों और वीडियो फ़ीड को एक जगह से मॉनिटर करने की व्यवस्था विकसित की गई.
इन केंद्रों में वीडियो एनॉलिटिक्स जैसी तकनीकों के इस्तेमाल की भी व्यवस्था की गई है.
इसका मतलब यह नहीं है कि हर आईसीसीसी, फ़ेशियल रिकॉग्निशन का इस्तेमाल करता है. लेकिन इन प्रणालियों ने शहरों में अलग-अलग सर्विलांस फ़ीड को एकसाथ मॉनिटर करने के लिए एक बुनियादी ढांचा ज़रूर तैयार किया है.
इस तक़नीक का इस्तेमाल सिर्फ़ जंतर मंतर तक सीमित नहीं

हमने यह भी देखा कि दिल्ली पुलिस पूर्व में दूसरे मामलों में फ़ेशियल रिकॉग्निशन तकनीक इस्तेमाल करने की बात कह चुकी है.
दिल्ली पुलिस के बयानों और आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक़, 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों और दूसरे मामलों की जांच में फ़ेशियल रिकॉग्निशन तकनीक का इस्तेमाल किया गया था.
मार्च 2020 में संसद में तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि दिल्ली दंगों की जांच के दौरान फ़ेशियल रिकॉग्निशन सॉफ़्टवेयर की मदद से 1,922 लोगों की पहचान की गई थी.
लेकिन किसी डिज़िटल पहचान को अंतिम सबूत मान लेने पर सवाल भी उठे हैं.
दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले में मोहम्मद आरिफ़ की पहचान को लेकर अदालत ने पुलिस की डिज़िटल पहचान पर सवाल उठाए थे.
उनके मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने यह माना कि डिज़िटल पहचान के आधार पर उनकी भूमिका को साबित करना, बाद की ट्रायल प्रक्रिया का विषय है. और उस स्तर पर यह उन्हें जेल में रखने के लिए पर्याप्त आधार नहीं था.
पत्रकार कौशिक राज के मुताबिक़, "यह मामला इस बात का उदाहरण है कि किसी शख़्स की डिज़िटल पहचान और उसकी वास्तविक पहचान के बीच अंतर हो सकता है."
जब पहचान ग़लत हो जाए

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फ़ेशियल रिकॉग्निशन के साथ सबसे बड़ा सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि सिस्टम किसी शख़्स को कितनी सटीकता से पहचान सकता है.
सवाल यह भी है कि अगर सिस्टम ग़लत हो जाए तो क्या होगा?
डिजिटल राइट्स रिसर्चर दिशा वर्मा, तेलंगाना में फ़ेशियल रिकॉग्निशन डेटाबेस के लीक हुए डेटा का उदाहरण देती हैं.
उनके मुताबिक़, "लीक हुए सिस्टम के स्क्रीनशॉट में एक शख़्स की तस्वीर की खोज के दौरान कई संभावित मैच दिखाई दिए थे, जिनमें उच्च प्रतिशत समानता दिखाई गई थी, जबकि तस्वीरों में चेहरे एक जैसे नहीं दिख रहे थे."
उनके मुताबिक़, ऐसी तकनीक में ग़लत पहचान का असर सिर्फ़ स्क्रीन पर दिखाई देने वाले एक प्रतिशत तक सीमित नहीं रहता.
अगर किसी शख़्स को अपराधी समझ लिया जाए तो उसे पुलिस के सामने पेश होना पड़ सकता है, उसका नाम किसी रिकॉर्ड में दर्ज हो सकता है और आगे की जांच प्रभावित हो सकती है.
यही वजह है कि विशेषज्ञ पूछते हैं कि जब कोई एल्गोरिदम किसी शख़्स को संदिग्ध या अपराधी के तौर पर चिह्नित करता है, तो उस फ़ैसले को चुनौती देने का अधिकार और प्रक्रिया क्या है.
निगरानी और डर

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जंतर मंतर पर निगरानी का असर सिर्फ़ तकनीकी नहीं था.
पत्रकार सृष्टि जायसवाल के मुताबिक़, प्रदर्शन स्थल पर पुलिस फ़ोटोग्राफ़रों की मौजूदगी भी लगातार महसूस हो रही थी.
वहीं, पत्रकार इला काज़मी कहती हैं कि जब उन्हें पता चला कि उनका चेहरा भी आसानी से पहचाना जा सकता है, तो उनके मन में यह डर आया कि आगे उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई हो सकती है.
प्रदर्शनकारियों में से कुछ ने चेहरे ढंककर आने की बात भी कही, क्योंकि उन्हें डर था कि कैमरों के ज़रिए उनकी पहचान की जा सकती है.
यहीं से निगरानी का एक दूसरा सवाल सामने आता है कि क्या किसी प्रदर्शन में शामिल होने का डर ही लोगों को अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करने से रोक सकता है?
दुनिया के कई हिस्सों में सार्वजनिक जगहों पर रियल-टाइम फ़ेशियल रिकॉग्निशन को लेकर कड़े नियम बनाए गए हैं.
डिज़िटल राइट्स समूह लगातार भारत में फ़ेशियल रिकॉग्निशन के पुलिस इस्तेमाल के लिए एक डेडिकेटेड व्यापक क़ानूनी ढांचे की कमी को लेकर सवाल उठाते रहे हैं.
क़ानून क्या कहता है?

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इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन को मिले आरटीआई जवाबों में दिल्ली पुलिस से फ़ेशियल रिकॉग्निशन के इस्तेमाल, डेटा रिटेंशन और प्राइवेसी इम्पैक्ट असिसमेंट से जुड़े सवाल पूछे गए थे.
इन जवाबों में दिल्ली पुलिस ने ऐसी कोई स्पष्ट डेटा रिटेंशन पॉलिसी, प्राइवेसी इम्पैक्ट असेसमेंट या विशेष एसओपी उपलब्ध नहीं कराई, जो इस तरह की निग़रानी को स्पष्ट रूप से नियंत्रित करती हो.
इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन के अपार गुप्ता के मुताबिक़, दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले लापता बच्चों को खोजने के संदर्भ में फ़ेशियल रिकग्निशन के इस्तेमाल की अनुमति दी थी. लेकिन उनका तर्क है कि उस आधार को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की निग़रानी तक स्वतः नहीं बढ़ाया जा सकता.
वो सुप्रीम कोर्ट के केएस पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ फ़ैसले का हवाला देते हैं, जिसमें निजता को मौलिक अधिकार माना गया था.
उनका सवाल है कि सार्वजनिक जगह पर मौजूद होने भर से किसी शख़्स की निजता का अधिकार ख़त्म नहीं हो जाता और राज्य को किसी शख़्स की निजता में दख़ल देने के लिए स्पष्ट क़ानूनी आधार की ज़रूरत होती है.
हालांकि, यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि अदालतों ने जंतर मंतर पर फ़ेशियल रिकॉग्निशन के इस्तेमाल की वैधता पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है.
जंतर मंतर से जुड़े मामलों में दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है.
इसके अलावा सीपीआई(एम) सांसद एए रहीम ने सुप्रीम कोर्ट में भी फ़ेशियल रिकॉग्निशन और बायोमेट्रिक सर्विलांस के इस्तेमाल को चुनौती दी है.
दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल एक हलफ़नामे में जंतर-मंतर पर हालिया प्रदर्शनों के दौरान फेशियल रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी(एफ़आरटी) के इस्तेमाल का बचाव किया है.
पुलिस का कहना है कि उसने बड़े पैमाने पर निग़रानी नहीं की, बल्कि पहले से आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों की पहचान के लिए इसका इस्तेमाल किया.
दिल्ली पुलिस से हमने क्या पूछा?

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हमने भी दिल्ली पुलिस से बार-बार संपर्क करने की कोशिश की. हम जानना चाहते थे कि-
- 20 जुलाई के प्रदर्शन में फ़ेशियल रिकॉग्निशन तकनीक का इस्तेमाल हुआ तो कौन-सा सॉफ़्टवेयर इस्तेमाल किया गया?
- किस डेटाबेस से चेहरों का मिलान किया गया?
- रिकॉर्ड की गई तस्वीरें और फ़ेशियल डेटा कितने समय तक रखा जाता है?
- क्या किसी प्रदर्शनकारी की पहचान कर उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई की गई?
- और इस पूरी व्यवस्था के लिए कौन-सा क़ानूनी आधार या एसओपी मौजूद है?
स्टोरी प्रकाशित किए जाने तक हमें इन सवालों का कोई विस्तृत जवाब नहीं मिला.
आख़िर सवाल किसका है?
20 जुलाई की रात जंतर मंतर पर भीड़ कम हो गई. प्रदर्शनकारी चले गए. सड़कें ख़ाली हो गईं.
लेकिन हमारी पड़ताल में निगरानी के कई स्तर सामने आए, सीसीटीवी, ड्रोन, सर्विलांस वैन, फ़ोटोग्राफ़र और फ़ेशियल रिकॉग्निशन जैसी तकनीकें.
लेकिन कई बुनियादी सवाल अब भी अनुत्तरित हैं.
किस डेटाबेस में चेहरा खोजा जा रहा है?
तस्वीर कितने समय तक रखी जाती है?
अगर सिस्टम किसी शख़्स को ग़लत पहचान ले तो उसकी ज़िम्मेदारी किसकी होगी?
और अगर किसी एल्गोरिदम ने किसी शख़्स को संदिग्ध मान लिया, तो वह उस फैसले को चुनौती कैसे देगा?
शायद एआई सर्विलांस का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि वो हमें कितनी अच्छी तरह पहचान सकता है.
सवाल यह भी है,
क्या हम उस सिस्टम को पहचान पा रहे हैं, जो हमें देख रहा है?
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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