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दूरबीन के सहारे चाँद-सितारों की सैर करवाने वालीं लद्दाख़ के एक गांव की लड़कियां
- Author, अमृता दुर्वे
- पदनाम, बीबीसी मराठी
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
रात के 10 बजे हैं, कड़ाके की ठंड पड़ रही है. तेज़ हवा पूरे इलाक़े में सनसना रही है.
गाँव के लोग और उनके मेहमान रात का खाना खा चुके हैं. लेकिन सोने की तैयारी करने के बजाय उनमें उत्साह दिखाई दे रहा है.
हर रात इस छोटे से गाँव के खुले आँगनों में एक अनोखा नज़ारा देखने को मिलता है. यहाँ दूरबीनें लगाई जाती हैं. इन्हें स्थानीय एस्ट्रो एम्बेसडर संभालते हैं. यह गाँव लद्दाख़ के दूरदराज़ इलाक़े में स्थित हानले है.
लेह से लगभग 253 किलोमीटर दूर बसा यह गाँव तेज़ी से एस्ट्रो-टूरिज़्म और तारों को देखने के एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभर रहा है.
इसे आधिकारिक तौर पर भारत का पहला डार्क स्काई रिज़र्व घोषित किया गया है.
हम इस अद्भुत आसमानी नज़ारे को अपनी आँखों से देखने के लिए लेह से हानले पहुँचे.
यहीं हमारी मुलाक़ात पलज़ेस आंग्मो, त्सेरिंग डोलकर, त्सेरिंग यांगडोल और पद्मा से हुई.
मुस्कुराती हुईं, शांत स्वभाव की और थोड़ी संकोची ये चारों युवतियां हानले और आसपास के गाँवों की रहने वाली हैं.
ये हानले की एस्ट्रो एम्बेसडर हैं.
हानले डार्क स्काई रिज़र्व के भीतर
डार्क स्काई रिज़र्व ऐसा इलाक़ा होता है जहाँ कृत्रिम रोशनी को सख़्ती से नियंत्रित किया जाता है.
जिस तरह वन्यजीव अभयारण्य जानवरों और पक्षियों की सुरक्षा करते हैं, उसी तरह डार्क स्काई रिज़र्व का मक़सद रोशनी से होने वाले प्रदूषण को रोकना होता है.
ताकि आसमान का साफ़ और स्पष्ट दृश्य बना रहे और खगोलीय अध्ययन प्रभावित न हो.
हानले, चांगथांग वन्यजीव अभयारण्य के अंदर स्थित है.
यह रिज़र्व लगभग 22 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है. इसके भीतर छह गाँव आते हैं.
सवाल है कि यह रिज़र्व यहीं क्यों बनाया गया.
इसका जवाब हानले की विशेष भौगोलिक स्थिति में छिपा है. हानले समुद्र तल से 14,764 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित है.
लद्दाख़, हिमालय और काराकोरम पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसा हुआ है.
दक्षिण से आने वाला मानसून हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं से टकराकर रुक जाता है.
इसी वजह से लद्दाख़ का अधिकांश इलाक़ा शुष्क बना रहता है. यह क्षेत्र ऊँचाई पर स्थित ठंडे रेगिस्तान से घिरा हुआ है.
इस कारण यहाँ की हवा में नमी बहुत कम होती है. साल में लगभग 260 रातों तक आसमान बिल्कुल साफ़ रहता है.
नतीजा यह होता है कि रात के आसमान में हज़ारों तारे नंगी आँखों से साफ़ दिखाई देते हैं.
यही वजह है कि हानले को दुनिया के बेहतरीन खगोलीय अवलोकन स्थलों में गिना जाता है.
इसी विशेषता को देखते हुए यहाँ इंडियन एस्ट्रॉनॉमिकल ऑब्ज़र्वेटरी की स्थापना की गई.
यहीं हिमालयन चंद्रा टेलीस्कोप भी मौजूद है.
पिछले 25 वर्षों से बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ एस्ट्रोफ़िज़िक्स यहाँ से महत्वपूर्ण शोध कर रहा है.
हालाँकि, लद्दाख़ में पर्यटन और वाहनों की संख्या बढ़ने के साथ वैज्ञानिकों की चिंता भी बढ़ने लगी है. उन्हें रोशनी से होने वाले प्रदूषण का डर सताने लगा है.
सड़क की लाइटें, वाहनों की हेडलाइटें और बढ़ते गेस्टहाउस रात के आसमान की प्राकृतिक चमक को प्रभावित कर सकते थे.
इससे खगोलीय अध्ययन पर भी असर पड़ने की आशंका थी. इसी वजह से इस पूरे इलाक़े को डार्क स्काई रिज़र्व घोषित किया गया.
शहरों में रहने वाले लोग आमतौर पर रात के आसमान में केवल कुछ प्रमुख तारामंडल ही देख पाते हैं.
लेकिन हानले आने वाले लोग आकाशगंगा यानी मिल्की-वे की विशाल चमकदार पट्टी को नंगी आँखों से देख सकते हैं.
यहाँ टूटते हुए तारे भी दिखाई देते हैं.
पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे कृत्रिम उपग्रहों को भी आसमान में धीरे-धीरे चलते हुए देखा जा सकता है.
रात के आसमान की रखवाली करने वालीं
वेधशाला (ऑब्ज़र्वेटरी) में सिर्फ़ पेशेवर वैज्ञानिक ही काम कर सकते हैं.
लेकिन तारों को देखने वाले पर्यटकों की बढ़ती दिलचस्पी ने एक नई पहल को जन्म दिया है.
इसका मक़सद स्थानीय लोगों को इस काम से जोड़ना और एस्ट्रो-टूरिज़्म को बढ़ावा देना था.
यहीं से एस्ट्रो एम्बेसडरों की शुरुआत हुई.
साल 2022 में लद्दाख़ प्रशासन और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ एस्ट्रोफ़िज़िक्स ने मिलकर हानले और आसपास के गाँवों के 24 युवाओं को खगोल विज्ञान की बुनियादी ट्रेनिंग दी.
15 दिनों के गहन प्रशिक्षण में उन्हें अंतरिक्ष और खगोल विज्ञान से जुड़े कई विषय सिखाए गए.
उन्हें ग्रहों, तारों और तारामंडलों की पहचान करना भी सिखाया गया. इसके साथ ही उन्हें दूरबीनें दी गईं.
दूरबीन चलाने की ट्रेनिंग भी दी गई. मोबाइल फ़ोन से मिल्की वे की तस्वीरें लेना भी सिखाया गया.
इन 24 प्रशिक्षुओं में 18 महिलाएँ थीं.
पलज़ेस आंग्मो, त्सेरिंग डोलकर, त्सेरिंग यांगडोल और पद्मा भी इसी पहले दल का हिस्सा थीं.
आंग्मो मूल रूप से पैंगोंग की रहने वाली हैं. शादी के बाद वह हानले आ गईं.
वहीं उनकी तीनों साथी यहीं पली-बढ़ी हैं.
डोलकर कहती हैं, "यहाँ का आसमान हमेशा से ऐसे ही टिमटिमाता रहा है."
वह कहती हैं, "2022 से पहले हमने कभी आसमान को इतने ध्यान से नहीं देखा था."
"लेकिन 2022 के बाद हमारी दिलचस्पी बढ़ती गई. अब हम हर रात आसमान को देखते हैं."
चारों महिलाएँ अपनी बात एक-दूसरे की बात पूरी करते हुए बताती हैं.
वे कहती हैं, "ट्रेनिंग के बाद जब पहली बार दूरबीन हमारे हाथ में आई तो हम उसे चलाने में झिझकते थे."
"हमें डर था कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए या कोई हिस्सा टूट न जाए."
"फिर धीरे-धीरे हमने इसे इस्तेमाल करना सीख लिया."
"अब हमें इसकी आदत हो गई है."
"हम दूरबीन को ठीक तरह से लगा लेते हैं और इसकी बुनियादी बातें समझते हैं."
"हाँ, अगर किसी बड़ी मरम्मत की ज़रूरत पड़ती है तो हम उसे सीधे वेधशाला ले जाते हैं."
हानले में तारों को निहारना
ये एस्ट्रो एम्बेसडर रात के आसमान के बारे में जानकारी देकर पर्यटकों का मार्गदर्शन करती हैं.
वे दूरबीन की मदद से लोगों को अंतरिक्ष के अद्भुत नज़ारे दिखाती हैं. हर शाम लगभग नौ बजे गतिविधियाँ शुरू हो जाती हैं.
मौसम और आसमान की स्थिति को देखते हुए दूरबीनों को सावधानी से लगाया जाता है.
स्थानीय होमस्टे में ठहरे पर्यटक मोटे पार्का, जैकेट और ऊनी टोपी पहनकर बाहर निकलते हैं.
बाहर आते ही साफ़ और चमकता हुआ आसमान उन्हें मंत्रमुग्ध कर देता है. कुछ ही देर में दूरबीनों के आसपास लोगों की भीड़ जमा हो जाती है.
लोग बुध, शुक्र और शनि ग्रह को देखने के लिए उत्साहित रहते हैं. चाँद की ऊबड़-खाबड़ सतह और गड्ढे भी दूरबीन से साफ़ दिखाई देते हैं.
हर रात 11 बजे गाँवों की बिजली बंद कर दी जाती है. इसके बाद पूरा इलाक़ा गहरे अंधेरे में डूब जाता है.
अंधेरा बढ़ते ही आसमान और भी चमकीला दिखाई देने लगता है. तारे पहले से ज़्यादा स्पष्ट नज़र आते हैं.
इसी दौरान पर्यटक मिल्की-वे की पृष्ठभूमि में अपनी तस्वीरें खिंचवाने की कोशिश करते हैं.
तब एस्ट्रो एम्बेसडर उनकी मदद के लिए आगे आती हैं. वे उन्हें मोबाइल कैमरे की सही सेटिंग्स के बारे में बताती हैं.
पद्मा कहती हैं, "जब लोग दूरबीन से आकाश देखते हैं और मिल्की-वे के साथ तस्वीर खिंचवाते हैं, तो उन्हें बहुत ख़ुशी होती है."
वह कहती हैं, "एक व्यक्ति की तस्वीर खिंचते ही बाक़ी लोग भी लाइन में लग जाते हैं."
"हम उन्हें मोबाइल की ज़रूरी सेटिंग्स बताते हैं."
"हम ख़ुद भी मिल्की-वे और चाँद की तस्वीरें लेते हैं."
"फिर उन्हें अपने स्टेटस पर लगाते हैं या एक-दूसरे को भेजते हैं."
ज़िंदगी बदल रही है
हानले चारों तरफ़ से पहाड़ों से घिरा हुआ है. एक पहाड़ी पर बौद्ध मठ बना हुआ है.
गाँव के पास एक सैन्य शिविर भी है. लद्दाख़ में यह आम नज़ारा है. हर रात 11 बजे बिजली बंद कर दी जाती है.
बिजली अगली सुबह लौटती है. हिमालयन चंद्रा टेलीस्कोप को चलाने के लिए यह अंधेरा ज़रूरी है.
लेकिन इसका मतलब यह भी है कि होमस्टे में बिजली से चलने वाले हीटर नहीं चल सकते.
ऐसे में लोगों को कड़ाके की ठंड का सामना करना पड़ता है.
इंडियन एस्ट्रॉनॉमिकल ऑब्ज़र्वेटरी ने हाल ही में 25 साल पूरे किए हैं. हालाँकि, हानले में पर्यटन की रफ़्तार कोरोना महामारी के बाद तेज़ हुई है.
सोशल मीडिया पर हानले के साफ़ और तारों भरे आसमान के वीडियो वायरल होने लगे. इसके बाद यहाँ आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ गई.
दुनिया की सबसे ऊँची मोटर योग्य सड़क उमलिंग ला जाने वाला रास्ता भी हानले से होकर गुज़रता है.
इस वजह से बड़ी संख्या में बाइक सवार पर्यटक भी यहाँ पहुँचने लगे.
वेधशाला में वरिष्ठ अभियंता और जनसंपर्क प्रमुख सोनम जोरफ़ेल कहते हैं, "ये एम्बेसडर लोगों को डार्क स्काई के महत्व के बारे में बताते हैं."
वह कहते हैं, "यह विज्ञान और समाज दोनों के लिए महत्वपूर्ण है."
"पर्यटकों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है."
"स्थानीय लोग तारों को दिखाने वाले गाइड की भूमिका निभाते हैं."
"वे लोगों को बताते हैं कि रोशनी को नियंत्रित रखना क्यों ज़रूरी है."
"पिछले दो-तीन वर्षों में वेधशाला और डार्क स्काई को लेकर सोशल मीडिया पर काफ़ी चर्चा हुई है."
"इसके बाद यहाँ अचानक बड़ी संख्या में पर्यटक आने लगे."
अब एस्ट्रो-टूरिज़्म यहाँ मज़बूती से अपनी जगह बना रहा है. अभी गाँव में कोई रेस्तराँ नहीं है. सिर्फ़ कुछ होटल मौजूद हैं.
लेकिन होमस्टे की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए सड़कें भी विकसित की जा रही हैं.
हानले और आसपास के गाँवों में नए कमरे बनते दिखाई देते हैं. लोग पर्यटकों को ठहराने के लिए अपने घरों का विस्तार कर रहे हैं.
आंग्मो, डोलकर, यांगडोल और पद्मा के परिवार भी होमस्टे चलाते हैं. उनके यहाँ भारत और विदेशों से आने वाले मेहमान ठहरते हैं.
पद्मा कहती हैं, "दिन भर मेहमानों की देखभाल, खाना बनाना, कमरे साफ़ करना और घर का काम करते हैं."
"फिर शाम नौ बजे के बाद तारों को दिखाने और दूरबीन लगाने की तैयारी शुरू हो जाती है."
दिन में रसोई का काम संभालने वाले यही हाथ रात में दूरबीनें भी लगाते हैं. वे लेज़र लाइट की मदद से पर्यटकों को तारामंडल दिखाती हैं.
चारों महिलाएँ विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी कर चुकी हैं. दूरबीनों तक पहुँच ने उनके लिए रोज़गार का एक नया रास्ता खोला है.
वे तारों को दिखाने के बदले पर्यटकों से शुल्क लेती हैं. वहीं होमस्टे से परिवार की आय भी बढ़ती है.
चारों महिलाएँ कहती हैं, "यह काम शुरू करने से पहले हमारे अंदर बिल्कुल आत्मविश्वास नहीं था."
"लेकिन अब बहुत बदलाव आया है."
"हम अलग-अलग जगहों से आने वाले लोगों से मिलते हैं."
"स्थानीय लोग और स्कूल के बच्चे भी आते हैं."
"हम उन्हें मुफ़्त में आसमान दिखाते हैं. उनसे कोई शुल्क नहीं लेते."
"जब कोई व्यक्ति दूरबीन से कोई अद्भुत चीज़ देखता है तो उसकी हैरानी देखने लायक़ होती है."
वे गर्व से बताती हैं कि अब उन्हें ख़र्च के लिए माता-पिता पर निर्भर नहीं रहना पड़ता.
वे कहती हैं, "पहले किसी चीज़ की ज़रूरत पड़ती थी तो माता-पिता से पैसे लेने पड़ते थे."
"अब हम अपनी कमाई बचाते हैं और अपनी पसंद की चीज़ ख़ुद ख़रीद सकते हैं."
अपनी कमाई से इन युवतियों ने आधुनिक स्मार्टफ़ोन भी ख़रीदे हैं. इनमें से एक ने आईफ़ोन भी लिया है.
वे एक टीम की तरह मिलकर काम करती हैं.
उन्हें अपने ही गाँव से लोगों को अंतरिक्ष की दुनिया दिखाने में ख़ुशी मिलती है. हँसते हुए वे कहती हैं कि हानले छोड़ने का उनका कोई इरादा नहीं है.
उनके मुताबिक़, यहाँ जैसा आसमान कहीं और नहीं मिलता.
जब उनसे पूछा गया कि उनके परिवार इस काम को कैसे देखते हैं, तो यांगडोल ने जवाब दिया.
उन्होंने कहा, "हम अपने परिवार वालों को भी दूरबीन से रात का आसमान दिखाते हैं."
"अब उन्हें भी यह बहुत पसंद आता है."
"वे तो हमसे कहते हैं कि हर शाम मेहमानों को तारे ज़रूर दिखाएँ."
"अगर एक दिन भी दूरबीन नहीं लगाते, तो वह पूछते हैं कि आज दूरबीन क्यों नहीं लगाई."
हानले में प्रवास के दौरान हमने पद्मा के होमस्टे में एक शाम बिताई.
वह रात के खाने के लिए रोटियाँ बना रही थीं. इसी दौरान हमने उनके माता-पिता से बातचीत की.
लद्दाख़ी और हिन्दी के बीच अनुवाद में हमारे साथी नामखा ने मदद की. पद्मा के माता-पिता अपनी बेटी की आत्मनिर्भरता से बेहद ख़ुश थे.
उनके पिता ने कहा, "हमारे ज़माने में आसमान और भी ज़्यादा साफ़ दिखाई देता था."
"मौसम अच्छा होता था तो हम खुले आसमान के नीचे सोते थे."
"हमें तारों के पारंपरिक लद्दाख़ी नाम पता हैं."
"लेकिन ये लड़कियाँ अब जो अंग्रेज़ी नाम बताती हैं, उन्हें हम पूरी तरह नहीं समझ पाते."
उन्होंने कहा, "कई बार मौसम ख़राब हो जाता है."
"तब पर्यटक निराश हो जाते हैं और हमें भी बुरा लगता है."
जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें पता था कि उनकी बेटी इतना अलग काम कर रही है.
तो उन्होंने कहा, "हमें इसकी तकनीकी बातें ज़्यादा समझ में नहीं आतीं."
"लेकिन लड़कियों को कोई न कोई काम तो करना ही चाहिए."
क्या उन्हें इस बात की चिंता नहीं होती कि उनकी बेटी देर रात अंधेरे में काम करती है.
इस पर उन्होंने कहा, "नहीं."
"वह यहीं गाँव में रहती है."
"यहाँ कोई जंगली जानवर भी नहीं आता."
"फिर डरने की क्या बात है."
दूसरे शहरों में माता-पिता को जो चिंताएँ सताती हैं, वे यहाँ दिखाई नहीं देतीं.
सच कहें तो हानले में देर रात घूमते हुए हमें भी कभी डर महसूस नहीं हुआ.
अगला क़दम
अब ये एस्ट्रो एम्बेसडर रात के आसमान को अच्छी तरह समझने लगी हैं.
वे ग्रहों और तारों की स्थिति जानने के लिए अलग-अलग ऐप का इस्तेमाल करती हैं.
लेकिन उनका मानना है कि उन्हें अभी और आगे बढ़ना है.
वे कहती हैं कि अगर उन्हें विशेषज्ञों से उन्नत प्रशिक्षण मिले तो वे अपने काम को और बेहतर बना सकेंगी.
उनके मुताबिक़, बेहतर दूरबीनें और उच्च गुणवत्ता वाले आईपीस मिलने से पर्यटकों का अनुभव भी अधिक समृद्ध होगा.
चार साल पहले जब उन्होंने यह सफ़र शुरू किया था, तब यह दुनिया उनके लिए बिल्कुल नई थी.
लेकिन आज ये चारों महिलाएँ अपने भविष्य को तारों और अंतरिक्ष की इसी दुनिया से जोड़ने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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