मोहसिन ख़ान: कोई यकीन नहीं करेगा, लेकिन मैंने रीना रॉय से शादी उनकी ख़ूबसूरती देखकर नहीं की थी

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- Author, रशीद शकूर
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए
- ........से, कराची
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 12 मिनट
यह सितंबर 1983 की बात है.
पाकिस्तान और भारत के बीच बेंगलुरु में टेस्ट सिरीज़ का पहला मैच अभी शुरू नहीं हुआ था कि भारतीय फ़िल्मों के एक मशहूर निर्देशक ने एक मशहूर पाकिस्तानी क्रिकेटर से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की.
जब वह क्रिकेटर से मिले, तो उन्होंने उन्हें अपनी फ़िल्म में काम करने का प्रस्ताव दे दिया. "मेरे पास आपके लिए एक रोल है."
"आप जानते हैं कि मैं इस समय क्रिकेट में बहुत ज़्यादा व्यस्त हूं. मैं जितने लंबे समय तक संभव हो सके, अपने देश के लिए खेलना चाहता हूं. लेकिन जब मैं क्रिकेट छोड़ दूंगा, तो आपसे वादा है कि मैं यह (रोल) करूंगा."
कुछ संवादों वाली यह मुलाक़ात उस समय तो ख़त्म हो गई.
लेकिन कुछ समय बाद दोनों की मुंबई में फिर मुलाक़ात हुई.
तब निर्देशक ने क्रिकेटर को उनका वादा याद दिलाया और कहा, "फ़िल्म का विषय अच्छा है. मैं धर्मेंद्र और विनोद खन्ना को पहले ही कास्ट कर चुका हूं. मैं चाहता हूं कि इस फ़िल्म में आपको तीसरे हीरो के रूप में कास्ट करूं."
और इस बातचीत के बाद उस क्रिकेटर की बॉलीवुड की चमकती दुनिया में एंट्री हो गई. वह पाकिस्तानी क्रिकेटर मोहसिन ख़ान थे, जबकि निर्देशक थे जेपी दत्ता.
जेपी दत्ता और मोहसिन ख़ान का ज़िक्र एक और नाम के बिना अधूरा है. वह नाम है अभिनेत्री रीना रॉय.
रीना रॉय और जेपी दत्ता के बीच दोस्ती थी. दरअसल, मोहसिन ख़ान के फ़िल्मी करियर को शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने में रीना रॉय ही सबसे आगे थीं.
मोहसिन ख़ान और रीना रॉय की पहली मुलाक़ात लंदन में हुई थी. उस समय मोहसिन ख़ान इंग्लैंड में लीग क्रिकेट खेल रहे थे और रीना रॉय अपनी बहन के साथ वहां आई हुई थीं.
मोहसिन को रीना रॉय से उनकी बहन ने ही मिलवाया था. उन्होंने बताया था कि रीना रॉय भारतीय फ़िल्मों की टॉप हीरोइनों में से एक हैं.
हालांकि मोहसिन ख़ान को फ़िल्मों में कोई दिलचस्पी नहीं थी. दुनिया उन्हें एक स्टाइलिश क्रिकेटर के रूप में पहचानती थी.
मोहसिन ख़ान ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए कहा, "मैंने शादी से पहले रीना रॉय की कोई फ़िल्म नहीं देखी थी. फ़िल्मों में मेरी दिलचस्पी सिर्फ़ इतनी थी कि घर से निकलते समय अगर अमिताभ बच्चन का कोई फ़िल्मी सीन स्क्रीन पर आ जाता, तो मैं कुछ पलों के लिए उसे देखने के लिए रुक जाता. इसके अलावा मैं फ़िल्में बिल्कुल नहीं देखा करता था."

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मोहसिन ख़ान और रीना रॉय की दोस्ती प्यार में बदल गई. फिर दोनों 1983 में शादी के बंधन में बंध गए.
भारत में हालांकि इससे पहले भी क्रिकेटर नवाब मंसूर अली ख़ान पटौदी और अभिनेत्री शर्मिला टैगोर की शादी हो चुकी थी. बाद में भी कई क्रिकेटरों ने अभिनेत्रियों से शादियां कीं. लेकिन किसी पाकिस्तानी क्रिकेटर का किसी भारतीय अभिनेत्री को जीवनसाथी बनाना अपनी तरह का पहला मामला था.
ये दोनों उस समय अपने-अपने करियर की बुलंदी पर थे. रीना रॉय की ज़िंदगी साइरा अली से शुरू होकर रूपा रॉय तक पहुंची और फिर रीना रॉय में बदल गई. यह नाम उन्हें फ़िल्ममेकर बीआर इशारा ने दिया था.
फ़िल्मी दुनिया के उतार-चढ़ाव में कुछ नाकामियां देखने के बाद उनके नाम के साथ नागिन, आशा और कालीचरण जैसी सफल फ़िल्में जुड़ चुकी थीं.
शादी के बाद रीना रॉय फ़िल्मी दुनिया से किनारा करके पाकिस्तान में रहने लगी थीं. लेकिन फिर वह समय आया जब मोहसिन ख़ान और रीना रॉय ने अपनी राहें अलग कर लीं.
90 के दशक की शुरुआत में दोनों के तलाक़ की ख़बर मीडिया में उतनी ही बड़ी सुर्ख़ी थी, जितनी उनकी शादी की ख़बर थी. उनकी शादी भी बहुत धूमधाम से हुई थी.
रीना रॉय तलाक़ के बाद वापस भारत लौट गईं. उन्होंने फिर से फ़िल्मों में काम भी किया. इसके बाद वह टीवी पर विभिन्न शो में मेहमान के रूप में भी नज़र आईं.
उनकी एक बेटी भी है, जिसका नाम पहले जन्नत था. बाद में उसका नाम सनम ख़ान हो गया.
दोनों के बीच बेटी की कस्टडी का मामला भी रहा. पहले बेटी अपने पिता के पास थी, लेकिन बाद में वह अपनी मां के पास चली गई.
मोहसिन ख़ान ने एक इंटरव्यू में कहा था, "मैंने एक इंसान से उसकी ख़ूबसूरती और शोहरत नहीं, बल्कि उसकी आदत और उसके अच्छे व्यवहार को देखकर शादी की थी. मैंने शादी से पहले रीना रॉय की कोई भी फ़िल्म नहीं देखी थी. मेरी इस बात पर शायद कोई यक़ीन नहीं करेगा, लेकिन यह सच है."
फ़िल्मी करियर
मोहसिन ख़ान का फ़िल्म बंटवारा में काम करने का अनुभव काफ़ी दिलचस्प रहा था. इस फ़िल्म की कास्ट में धर्मेंद्र, विनोद खन्ना और शम्मी कपूर जैसे बड़े नाम शामिल थे.
उनके सामने अभिनय करना आसान काम नहीं था. ख़ासकर एक ऐसे व्यक्ति के लिए, जिसे इस काम का पहले कोई अनुभव न हो. लेकिन जेपी दत्ता की हिदायतों और सलाहों ने मोहसिन ख़ान के लिए एक पुलिस अफ़सर का किरदार निभाना आसान बना दिया.
जेपी दत्ता ने मोहसिन ख़ान को क्रिकेट की भाषा में एक सीन समझाया. उन्होंने कहा, "मान लीजिए आपने शतक बनाया है, लेकिन फिर भी आपकी टीम हार गई है. ऐसी स्थिति में आप ख़ुशी से ज़्यादा दर्द को किस तरह महसूस करेंगे."
मोहसिन ख़ान के लिए ख़ुशी का पल वह था, जब फ़िल्म बंटवारा में अपने रोल के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता की श्रेणी में नामांकित किया गया था.
इस श्रेणी में उनके साथ नाना पाटेकर, विनोद खन्ना, अमरीश पुरी और पंकज कपूर भी नामांकित थे. यह अवॉर्ड फ़िल्म परिंदा के लिए नाना पाटेकर ने जीता था.
मोहसिन ख़ान को व्यक्तिगत रूप से फ़िल्म साथी पसंद है. इसके निर्देशक महेश भट्ट थे.
मोहसिन ख़ान ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए कहा, "भट्ट साहब बेहद ज्ञानी इंसान हैं. आप उनके साथ बैठकर ज़िंदगी के दर्शन को बहुत अच्छी तरह समझ सकते हैं."
मोहसिन ख़ान को फ़िल्म साथी की कई बातें पसंद थीं. इसके अलावा कुमार सानू का गाना "ज़िंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए" भी उन्हें बेहद प्रभावित कर गया था.
मोहसिन ख़ान ने बॉलीवुड की 13 फ़िल्मों में काम किया. 1997 में रिलीज़ हुई महानता उनकी आख़िरी बॉलीवुड फ़िल्म थी.
मोहसिन ख़ान ने कई पाकिस्तानी फ़िल्मों में भी काम किया. उनकी पहली फ़िल्म राज़ थी. इसमें उनके साथ मशहूर अभिनेत्री बाबरा शरीफ़ थीं. बाबरा शरीफ़ के साथ उन्होंने एक और फ़िल्म प्यासा सावन में भी हीरो की भूमिका निभाई थी.
उनकी अन्य पाकिस्तानी फ़िल्मों में हाथी मेरे साथी, जन्नत, इंसानियत, बेटा, सब के बाप, चोरों के बाप, घूंघट, दिल तेरा आशिक़ और चलती का नाम गाड़ी शामिल थीं.
पाकिस्तान में उनकी आख़िरी फ़िल्म साला बिगड़ा जाए थी, जो 1999 में रिलीज़ हुई थी.
मोहसिन ख़ान की अधिकांश फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर फ़्लॉप रहीं.
क्रिकेट को गंभीरता से लेने की सलाह

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मोहसिन ख़ान का जन्म एक पढ़े-लिखे परिवार में हुआ था. उनके पिता पाकिस्तान नेवी में अफ़सर थे, जबकि उनकी मां टीचर और वाइस प्रिंसिपल थीं.
एक तरफ़ अनुशासन की शिक्षा मिली, तो दूसरी तरफ़ पढ़ाई पर पूरा ध्यान दिया गया. इन दोनों ख़ूबियों ने मोहसिन ख़ान के व्यक्तित्व को अच्छी तरह निखारा.
उनके पिता ने गढ़ विश्वविद्यालय की हॉकी टीम का भी प्रतिनिधित्व किया था. वे ख़ुद खिलाड़ी थे, इसलिए उन्होंने मोहसिन ख़ान को भी खेलों के मामले में प्रोत्साहित किया.
इसी का नतीजा था कि मोहसिन ख़ान ने छात्र जीवन में लगभग हर खेल में हिस्सा लिया. यहां तक कि वे पाकिस्तान के नेशनल जूनियर बैडमिंटन चैंपियन भी बन गए.
लेकिन कॉलेज में फ़िज़िक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स जैसे विषय थे. इसलिए पढ़ाई पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता था. क्रिकेट तो उन्होंने नाममात्र ही खेली थी.
एक मैच में खिलाड़ियों की कमी होने पर फ़िज़िक्स के शिक्षक मुकर्रम शेरवानी ने, जो स्पोर्ट्स टीचर भी थे, उन्हें कॉलेज का एक मैच खेलने के लिए कहा. उस मैच में उन्होंने शतक बना दिया.
उस मैच के एक अंपायर उमर ख़ान थे. वे पूर्व फ़र्स्ट क्लास क्रिकेटर और टेस्ट अंपायर भी रह चुके थे.
उन्होंने मोहसिन ख़ान की बल्लेबाज़ी देखकर उन्हें सलाह दी कि क्रिकेट को गंभीरता से खेलो. इसके बाद मोहसिन ख़ान ने सही मायनों में क्रिकेट से अपना रिश्ता जोड़ लिया.
अंडर-19 स्तर पर खेलते हुए उन्होंने तिहरा शतक भी बनाया. इसके बाद उन्होंने कराची और पाकिस्तान यूनिवर्सिटीज़ की टीमों की ओर से फ़र्स्ट क्लास क्रिकेट भी खेली.
लॉर्ड्स का ऐतिहासिक दोहरा शतक

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मोहसिन ख़ान ने अपने टेस्ट करियर की शुरुआत उस समय की, जब पाकिस्तान के स्टार क्रिकेटर, केरी पैकर क्रिकेट खेलने चले गए थे.
उस दौर में अपेक्षाकृत नए खिलाड़ियों की टीम की कप्तानी वसीम बारी को संभालनी पड़ी थी. जब स्टार क्रिकेटर वापस आए, तो मोहसिन ख़ान को उनके बीच अपनी जगह बनाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी.
इस दौरान वह उन खिलाड़ियों में भी शामिल थे जिन्होंने जावेद मियांदाद की कप्तानी के ख़िलाफ़ बग़ावत की थी.
1982 में श्रीलंका के ख़िलाफ़ लाहौर टेस्ट में बनाया गया शतक मोहसिन ख़ान को पहली बार भरपूर आत्मविश्वास देने वाला साबित हुआ.
लेकिन बड़ी सफलताएं अभी आना बाकी थीं. इसका शिखर उसी साल लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर खेली गई उनकी शानदार दोहरी शतकीय पारी थी.
यह पारी ख़ूबसूरत स्ट्रोक्स का बेहद आकर्षक प्रदर्शन थी. जिसने भी इसे देखा, वह इसकी तारीफ़ किए बिना नहीं रह सका.
इस पारी ने लॉर्ड्स में पाकिस्तान की पहली जीत की नींव रखी. इसके बाद मुदस्सर नज़र ने छह विकेट लेकर गोल्डन आर्म गेंदबाज़ के रूप में ख़ूब नाम कमाया. लेकिन परीक्षा अभी ख़त्म नहीं हुई थी.
पाकिस्तान को जीत के लिए सिर्फ़ 18 ओवरों में 76 रन का लक्ष्य मिला था. उस समय पाकिस्तान टीम के लिए सबसे बड़ा ख़तरा ख़राब मौसम था.
ऐसी स्थिति में मोहसिन ख़ान ने जावेद मियांदाद के साथ तेज़ी से रन बनाए. दोनों ने सिर्फ़ 13.1 ओवरों में पाकिस्तान को जीत दिला दी.
1982 मोहसिन ख़ान के करियर का सबसे बेहतरीन साल था. इस साल उन्होंने एक कैलेंडर वर्ष में एक हज़ार रन पूरे करने वाले पहले पाकिस्तानी बल्लेबाज़ होने का सम्मान हासिल किया था.
इसी साल उन्होंने लॉर्ड्स की दोहरी शतकीय पारी के अलावा भारत, ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका के ख़िलाफ़ टेस्ट मैचों में भी शतक बनाए थे. संयोग से ये तीनों शतक उन्होंने लाहौर में बनाए थे.
डॉन ब्रैडमैन से न मिल पाने का अफ़सोस

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मोहसिन ख़ान की एक और यादगार सिरीज़ 1983-84 में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ रही थी. इसमें उन्होंने एडीलेड में 149 और मेलबर्न में 152 रनों की शानदार पारियां खेली थीं.
यह पहला मौक़ा था जब किसी पाकिस्तानी बल्लेबाज़ ने ऑस्ट्रेलिया में लगातार दो टेस्ट मैचों में शतक बनाए. जिस गेंदबाज़ी आक्रमण के ख़िलाफ़ उन्होंने ये साहसी पारियां खेलीं, उसमें डेनिस लिली, रॉडनी हॉग, जेफ़ लॉसन और कार्ल रैकमैन जैसे ख़तरनाक तेज़ गेंदबाज़ शामिल थे.
मोहसिन ख़ान को आज भी एक बात का बहुत अफ़सोस है कि वह एडीलेड टेस्ट की उस पारी के दौरान महान सर डॉन ब्रैडमैन से नहीं मिल सके.
सर डॉन ब्रैडमैन अपने विशेष बॉक्स से मोहसिन ख़ान की बल्लेबाज़ी देख रहे थे. लेकिन मोहसिन के शतक पूरा करने से पहले ही सर डॉन ब्रैडमैन को तबीयत ठीक न होने की वजह से वापस जाना पड़ा.
इस तरह मोहसिन ख़ान की ब्रैडमैन से मिलने की इच्छा पूरी नहीं हो सकी. लेकिन बाद में इयान चैपल ने मोहसिन को बताया कि सर डॉन ब्रैडमैन ने उनकी जितनी भी बल्लेबाज़ी देखी, उससे वे बहुत प्रभावित हुए थे. उन्होंने कहा था, "यह लड़का बल्लेबाज़ी करना जानता है."
इसी तरह मेलबर्न की शानदार पारी के बाद मोहसिन ख़ान के बारे में डेनिस लिली ने इमरान ख़ान से कहा था, "आज मैंने दुनिया के कुछ बेहतरीन बल्लेबाज़ों में से एक को गेंदबाज़ी की है."
जब इमरान ने यह बात मोहसिन से कही, तो मोहसिन ने उनसे पूछा, "क्या आप मेरा दिल रखने के लिए यह कह रहे हैं?" इस पर इमरान ख़ान ने जवाब दिया, "नहीं, यह बिल्कुल सच है."
चीफ़ सेलेक्टर से तीखी बातचीत

1984 में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ लाहौर टेस्ट में पाकिस्तान की दूसरी पारी अभी शुरू भी नहीं हुई थी कि पता चला, मोहसिन ख़ान को इस टेस्ट सिरीज़ के बाद होने वाले वनडे सिरीज़ से बाहर कर दिया गया है.
बोर्ड ने टीम की घोषणा की प्रेस रिलीज़ भी मीडिया को जारी करने के लिए तैयार कर ली थी.
यह बात इसलिए भी अजीब थी क्योंकि सेलेक्टरों ने टेस्ट मैच ख़त्म होने का इंतज़ार भी नहीं किया था. मैच की एक पारी अभी बाकी थी.
उस समय मोहसिन ख़ान को इस बात की जानकारी नहीं थी. उन्हें यह बात तब पता चली, जब वह दूसरी पारी में बल्लेबाज़ी करने जाने वाले थे.
वह इस पारी में ऐसा प्रदर्शन करना चाहते थे, जो सेलेक्टरों को ग़लत साबित कर दे. उन्होंने इस पारी में शानदार शतक बना दिया. इस पारी ने सेलेक्टरों को अपना फ़ैसला बदलने पर मजबूर कर दिया.
मोहसिन ख़ान कहते हैं, "जब मैं शतक बनाकर ड्रेसिंग रूम में वापस आया, तो वहां मौजूद हर व्यक्ति मेरी तारीफ़ कर रहा था. मुझे बताया गया कि टीम की घोषणा मैच के बाद की जानी थी. लेकिन मेरे इस शतक के बाद उसे रोक लिया गया है."
"इसी दौरान चीफ़ सेलेक्टर साहब भी मेरे पास आ गए. वह कहने लगे, 'मैं आपके प्रदर्शन से बहुत ख़ुश हूं और उम्मीद करता हूं कि अगली सिरीज़ में भी आप इसी अंदाज़ में खेलेंगे.'"
मेरे जवाब ने उन्हें हैरान कर दिया. मैंने कहा, 'क्या आपने मुझसे पूछा है कि मैं अगले मैच के लिए उपलब्ध हूं या नहीं?'
उन्होंने मुझसे कहा, "मुझे समझ नहीं आ रहा कि आप मुझसे इस अंदाज़ में क्यों बात कर रहे हैं?"
मैंने उनसे कहा, "अपनी ये बातें अपने पास रखिए, क्योंकि आप किसी को बेवक़ूफ़ नहीं बना रहे हैं.' यहां तक कि मैंने उनसे यह भी कह दिया कि मैं लगभग एक घंटे में अपनी उपलब्धता के बारे में फ़ैसला करूंगा. अगर वे चाहें तो इंतज़ार कर सकते हैं."
मोहसिन ख़ान ने जिन चीफ़ सेलेक्टर से यह बातचीत की थी, वे हसीब अहसान थे.
मुदस्सर नज़र के साथ सफल जोड़ी
विज़डन ने 2008 में टेस्ट क्रिकेट के प्रदर्शन के आधार पर 10 सर्वश्रेष्ठ ओपनिंग जोड़ियों की सूची तैयार की थी. इसमें मोहसिन ख़ान और मुदस्सर नज़र को नौवीं सर्वश्रेष्ठ ओपनिंग जोड़ी क़रार दिया गया था.
इन दोनों ने अपने टेस्ट करियर में साथ खेलते हुए 54 टेस्ट पारियों में ओपनिंग साझेदारी के रूप में कुल 2054 रन बनाए थे. इनमें तीन शतकीय और सोलह अर्धशतकीय साझेदारियां शामिल थीं.
यह उस दौर के कुछ सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में गिनी जाती थी. दोनों के बीच गहरी मानसिक समझ थी. इससे पहले पाकिस्तान क्रिकेट में ऐसी समझ माजिद ख़ान और सादिक़ मोहम्मद की जोड़ी में देखने को मिली थी.
क्रिकेट की ओर दोबारा लौटे

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फ़िल्मी दुनिया को अलविदा कहने के बाद मोहसिन ख़ान ने क्रिकेट से फिर अपना रिश्ता जोड़ लिया.
वे चीफ़ सेलेक्टर भी बने और कुछ समय तक पाकिस्तान क्रिकेट टीम के हेड कोच भी रहे. हेड कोच के रूप में उनकी सबसे बड़ी सफलता दुनिया की नंबर एक टीम इंग्लैंड को टेस्ट सिरीज़ में व्हाइटवॉश करना थी.
उस टीम के कप्तान मिस्बाह-उल-हक़ थे. इसके अलावा उनकी कोचिंग में पाकिस्तान टीम ने श्रीलंका और बांग्लादेश के दौरों पर तीनों फ़ॉर्मेट, यानी टेस्ट, वनडे और टी20 में सफलताएं हासिल की थीं.
वे क्रिकेट कमेटी के अध्यक्ष भी रहे. इस कमेटी में वसीम अकरम, मिस्बाह-उल-हक़ और उरूज मुमताज़ शामिल थीं.
मोहसिन ख़ान ने जब क्रिकेट में अपनी पहली पारी समाप्त की, तब उनकी उम्र 31 साल थी. उस समय दुनिया के कई ओपनर तेज़ गेंदबाज़ी का सामना करते हुए घबराहट महसूस करते थे.
लेकिन मोहसिन ख़ान की बल्लेबाज़ी में भरपूर आत्मविश्वास नज़र आता था.
दुनिया उनके ख़ूबसूरत स्ट्रोक्स के साथ-साथ उनकी स्टाइलिश शख़्सियत की भी क़ायल थी. मैदान पर वे सफ़ेद किट पहनकर और सिर पर टोपी लगाकर अपने सभी साथियों से अलग और अनोखे दिखाई देते थे.
शायद उनकी इसी शख़्सियत का असर था, जो उन्हें क्रिकेट छोड़ने के बाद बॉलीवुड तक ले गया था.
क्रिकेट और फ़िल्म में ज़्यादा मुश्किल क्या
यह पूछे जाने पर कि क्रिकेट और फ़िल्म में ज़्यादा मुश्किल क्या है, मोहसिन ख़ान ने कहा, "दोनों काम आसान नहीं हैं. लेकिन क्रिकेट ज़्यादा मुश्किल है, क्योंकि इसमें लाइव प्रदर्शन होता है और ग़लती की कोई गुंजाइश नहीं होती."
"जबकि फ़िल्म की शूटिंग में री-टेक की सुविधा होती है. एक से ज़्यादा ग़लतियां भी हो जाएं, तब भी आपको सबसे अच्छा शॉट मिल जाता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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