ख़ुद को औरत साबित करने का ‘बोझ’

दुती चांद, भारतीय एथलीट
    • Author, डॉक्टर सिल्विया कैंपोरेज़ी
    • पदनाम, प्राध्यापक, बायोएथिक्स एंड सोसाइटी, किंग्ज़ कॉलेज लंदन
  • प्रकाशित

जीन विविधिता की वजह से एथलीट्स पर लग रहे प्रतिबंधों से एथलेटिक संगठनों की अंतरराष्ट्रीय संघ दोराहे पर है.

कुछ एथलीट्स के टेस्ट से सामने आया है कि वो अन्य से अलग हैं और इस कड़ी में ताज़ा मामला भारतीय महिला एथलीट दुती चांद का है.

स्विटज़रलैंड के शहर लुसान में 18 वर्षीय भारतीय एथलीट दुती चांद के मामले की सुनवाई चल रही है.

इन्हें जुलाई 2014 में ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेलों के कुछ दिन पहले ही अयोग्य करार दिया गया था.

अधिक टेस्टोस्टेरोन

दुती चांद
इमेज कैप्शन, दुती चांद को कॉमनवेल्थ खेलों के कुछ दिन पहले ही अयोग्य ठहरा दिया गया था.

उनके शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा सामान्य से ज़्यादा पाई गई थी. टेस्टोस्टेरोन वो हार्मोन है जो पुरुषोचित गुणों को नियंत्रित करता है.

एथलेटिक संगठनों का अंतरराष्ट्रीय संघ (आईएएफ़) और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) की नीतियों के मुताबिक़, किसी एथलीट के शरीर में टेस्टोस्टेरोन की क्या सीमा हो, यह तय किया गया है.

आईएएफ़ का मानना है कि हाइपरएंड्रोजेनिज़्म की वजह से खिलाड़ियों को अनुचित फ़ायदा मिलता है और यह सभी खिलाड़ियों को बराबर का मौक़ा दिए जाने के सिद्धांत का उल्लंघन करता है.

हाइपरएंड्रोजेनिज़्म उस स्थिति को कहते हैं जब किसी महिला के शरीर में जीन की विविधिताओं की वजह से सामान्य से अधिक मात्रा में टेस्टोस्टेरोन बनता है.

रूढिवादी सोच

दुती चांद, भारतीय एथलीट

पर यह मानना ग़लत है. जीन की विविधिता से पैदा होने वाली ऐसी बहुत सी स्थितियां हैं, जो आईएएफ़ के नियंत्रण में नहीं है. हालांकि उनसे भी खिलाड़ियों को फ़ायदा मिलता है, पर उन्हें प्रतिस्पर्धा के लिए अनुचित नहीं माना जाता.

फिर हम हाइपरएंड्रोजेनिज़्म को अलग कर क्यों देखते हैं? ऐसा इसलिए है कि खेलकूद में महिलाओं को लेकर हमारी सामाजिक सोच अभी भी रूढ़िवादी है.

साबित करो, तुम औरत हो

ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स

औरत होने के सामान्य मानकों पर ख़रा नहीं उतरने वाली महिला एथलीटों को कई तरह के परीक्षणों से गुजरना पड़ता है. महिला एथलीटों पर इसका ज़बरदस्त दवाब होता है कि वे अपने को औरत साबित करें ताकि उनके लिंग को लेकर किसी तरह का सवाल न उठे.

ख़ुद को औरत साबित करने का बोझ महिला एथलीटों को उठाना पड़ता है.

इसी तरह उन पर यह साबित करने का बोझ भी होता है कि अधिक टेस्टोस्टेरोन की वजह से उन्हें कोई फ़ायदा नहीं मिल रहा है.

आईएएफ़ ने दुती चांद और दूसरे एथलीटों को जो मेडिकल जांच कराने को कहा है, वह ग़ैर ज़रूरी है. इससे इन खिलाड़ियों पर काफ़ी ज़्यादा आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और शारीरिक बोझ पड़ता है.

खिलाड़ियों पर दवाब

बबीता कुमारी, भारतीय महिला एथलीट

ऐसी कई महिलाएं हैं, जो हाइपरएंड्रोजेनिज़्म के असर में हैं. पर उन्हें एंड्रोजेन के प्रभाव को दबाने के लिए किसी तरह की थेरेपी या सर्जरी नहीं करानी होती है.

हाइपरएंड्रोजेनिज़्म तो पॉलीसिस्टिक ओवेरिक सिंड्रोम की वजह से भी होता है और तक़रीबन 10 से 15 फ़ीसदी महिलाएं इसकी चपेट में आ जाती हैं.

खेल के मैदान में वापसी करने के लिए आईएएफ़ जो इलाज़ कराने को कहता है, उसका ख़र्च भी उस खिलाड़ी को ही उठाना पड़ता है.

भारत का खेल मंत्रालय इसके ख़िलाफ़ अपील करने के लिए दुती चांद को आर्थिक मदद दे रहा है, वर्ना वह तो अपील भी नहीं कर पातीं.

'शरीर में बदलाव मंजूर नहीं'

महिला मुक्केबाज़

आईएएफ़ के नियमों के मुताबिक़, दुती चांद एंड्रोजेन के स्तर को कम कर पाती हैं तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में फिर भाग लेने की इजाज़त दी जा सकती है.

दुती चंद ने ऐसा करने से साफ़ इंकार कर दिया है और इसके ख़िलाफ़ अपील की है.

उन्होंने ‘द हिंदू’ अख़बार से अक्तूबर 2014 में ही कहा था, “मुझे लगता है कि खेल में भाग लेने के लिए अपने शरीर में बदलाव करना ग़लत है. मैं किसी के लिए अपने शरीर में कोई तब्दीली नहीं करने जा रही.”

ग़लत नियम

भारतीय महिला खिलाड़ी

उनके वक़ील शायद यह तर्क दें कि चूंकि पुरुषों के लिए टेस्टोस्टेरोन के स्तर की कोई सीमा तय नहीं है, इसलिए महिलाओं के लिए यह नियम अनुचित है.

पर इसमें जोख़िम भी है. यह मुमकिन है कि इसके बाद आईएएफ़ पुरुषों के लिए भी टेस्टोस्टेरोन की सीमा तय कर दे.

आईएएफ़ आंकड़ों से यह साबित करेगा कि टेस्टोस्टेरोन की अधिक मात्रा से खेलों में फ़ायदा पंहुचता है.

इस मामले में अभी तक कुछ भी साबित नहीं हुआ है, लिहाज़ा इस तर्क को साबित करना मुश्किल होगा और इस पर वैज्ञानिकों की राय ली जाएगी.

सामान्य से अलग होना ग़लत नहीं

महिला मुक्केबाज़

इसलिए इस मामले में बचाव के लिए दूसरे तर्क का सहारा लेना होगा. वक़ीलों को यह तर्क देना होगा कि एंड्रोजेन की अधिक मात्रा से फ़ायदा भले होता हो, यह ग़लत कतई नहीं है.

दूसरे शब्दों में, इसका कोई मतलब नहीं है कि एंड्रोजेन के अधिक मात्रा से फ़ायदा होता है या नहीं.

हमें यह देखना चाहिए कि यह अनुचित है या नहीं. हमें यह भी बताना होगा कि हम इन विषयों पर तो काफी कुछ कर रहे हैं, पर खेलों में उत्कृष्टता, लिंग या ख़ुद को औरत साबित करने जैसे बड़े मुद्दों पर तो सोच ही नहीं रहे हैं.

दोराहे पर अाईएएफ़

श्रीलंका की महिला एथलीट

आईएएफ़ अब एक द्वंद्व से जूझ रहा है. या तो वो किसी भी तरह की जैविक विविधिता वाले खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लगा दे या उन सभी लोगों को प्रतिस्पर्धा में भाग लेने दे जो ‘सामान्य से हट कर’ हैं.

इसमें हाइपरएंड्रोजेनिज़्म से प्रभावित लोग भी शामिल हैं.

यदि आईएएफ़ ऐसा नहीं करता है तो वह सभी को बराबर का मौक़ा देने की कोशिश करते हुए इसके उलट ख़ुद कई तरह की अनुचित स्थितियां पैदा कर देगा.

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