शनिवार, 04 फ़रवरी, 2006 को 22:56 GMT तक के समाचार
सीरिया में डेनमार्क और नॉर्वे के दूतावासों में आग लगाए जाने के बाद दोनों देशों ने अंतरराष्ट्रीय दायित्व न निभाने के लिए सीरिया की निंदा की है.
डेनमार्क और नॉर्वे ने कहा है कि सीरियाई अधिकारियों ने कार्रवाई नहीं की जिसके चलते दूतावासों पर हमले हुए.
दोनों देशों ने कहा कि ये स्वीकार नहीं किया जा सकता.
सीरिया की राजधानी दमिश्क में शनिवार को हज़ारों प्रदर्शनकारियों ने पहले डेनमार्क के दूतावास पर पत्थर बरसाए और उसके बाद नॉर्वे के दूतावास पर भी हमला किया.
नारे लगा रहे लोगों में से कुछ ने डेनमार्क के झंडे को हटा दिया और उसकी जगह एक और झंडा लगा दिया जिसपर लिखा था - "अल्लाह के अलावा कोई दूसरा ख़ुदा नहीं है और मोहम्मद अल्लाह के पैग़ंबर हैं"
दूतावास को बंद कर दिया गया है.
सीरियाई प्रदर्शनकारियों ने फ़्रांस के दूतावास पर हमला करने की भी कोशिश की लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया. डेनमार्क और नॉर्व ने अपने नागरिकों से सीरिया छोड़ने की बात कही है.
निंदा
सीरिया में पिछले कुछ दिनों से डेनमार्क के दूतावास के बाहर लगातार धरने-प्रदर्शन हो रहे हैं.
ईरान में राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने कहा है कि सरकार को उन सभी देशों के साथ व्यावसायिक और व्यापारिक संबंध तोड़ने के बारे में विचार करना चाहिए जहाँ के अख़बारों में ऐसे कार्टून प्रकाशित हुए हैं.
ये कार्टून पिछले वर्ष सबसे पहले डेनमार्क के अख़बार में छपे थे जिसके बाद से इन्हें कुछ यूरोपीय देशों और जॉर्डन में फिर प्रकाशित किया गया है.
रोमन कैथोलिक चर्च ने भी कार्टूनों के प्रकाशन की निंदा की है और कहा है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब धार्मिक आस्थाओं को चोट पहुँचाना नहीं होना चाहिए.
वैटिकन के एक प्रवक्ता ने कहा कि अगर विभिन्न देशों को शांति के साथ रहना है तो उन्हें एक-दूसरे को सम्मान देना चाहिए.
जबकि डेनमार्क के प्रधानमंत्री ने कहा है कि वे अख़बारों की ओर से तो माफ़ी नहीं माँग सकते पर इस प्रकरण के चलते जिनकी भावनाएँ आहत हुई हैं उससे उन्हें दुख हुआ है .
संपादक गिरफ़्तार
इस बीच जॉर्डन में उस समाचारपत्र के संपादक को गिरफ़्तार कर लिया गया है जिसमें ये विवादित कार्टून छापे गए थे.
जिहाद मोमानी नामक संपादक को एक दिन पहले ही नौकरी से हटा दिया गया था.
मोमानी ने अपने अख़बार में डेनमार्क के समाचारपत्र में छपे तीन कार्टूनों को फिर से प्रकाशित किया था और साथ ही इस संबंध में एक संपादकीय भी छापा था.
इस संपादकीय में ये सवाल उठाया गया था कि कार्टूनों को लेकर मुस्लिम जगत में जो क्रुद्ध प्रतिक्रिया नज़र आ रही है वह क्या सही है.
जोर्डन के शाह अब्दुल्ला ने हज़रत मोहम्मद के कार्टूनों की निंदा की थी और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक अनावश्यक प्रयोग बताया था.