मिलिए पतंगों के 'सबसे बड़े शौक़ीन' से

प्रणवीर सिंह
    • Author, रोहित घोष
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

कानपुर के बीचों-बीच स्वरुप नगर इलाक़े में प्रणवीर सिंह का तीन मंज़िला मकान है.

घर के चौथे मंज़िल पर सिर्फ़ दो कमरे हैं. उन दो कमरों में रखे पतंगों और मांझो के चरख़ों को आप अगर गिनना शुरू करें तो आपको कई घंटे लग जाएं.

और अगर प्रणवीर सिंह आपको अपने एक एक पतंग और मांझे की ख़ासियत बताने लगे तो शायद कई दिन भी लग जाएं.

प्रणवीर सिंह जो वीरू भाई के नाम से पतंगबाज़ों के बीच मशहूर हैं, ने बीबीसी को बताया, "मेरे पास क़रीब 8000 पतंगें और 2800 मांझों के चरख़े हैं."

उनका दावा है की इतनी संख्या में पतंग और मांझे शायद ही किसी पतंग उड़ाने के शौक़ीन के पास हों.

वे कहते हैं, "मुझे सिर्फ़ पतंग उड़ाने का ही नहीं, पतंग और मांझा इकट्ठा करने का भी शौक़ है."

प्रणवीर सिंह

वीरू भाई कहते हैं की बचपन से ही उनके दो शौक़ थे - एक क्रिकेट खेलने का और दूसरा पतंग उड़ाने का.

जैसे-जैसे उनकी उम्र ढली उनके क्रिकेट का शौक़ तो ख़त्म हो गया पर पतंगबाज़ी का शौक़ और परवान चढ़ने लगा. पतंग और मांझे के लिए पैसे चाहिए.

जैसे ही वे अपने पैरों पर खड़े हुए, वीरू भाई अपना कमाया पैसा और समय पतंग और मांझा ख़रीदने में लगाने लगे.

उन्होंने ज़मीन पर बिछाई जाने वाली टाइल्स की एक फ़ैक्ट्री खोल ली थी.

उन्होंने कहा, "मैं अभी छप्पन साल का हूं. क़रीब तीस साल पहले मुझे पतंग और मांझा ख़रीदने का जुनून हुआ. फिर मैं पतंग और मांझें ख़रीदता चला गया और आज मेरे पास क़रीब 8000 पतंगे और 2800 मांझे की चर्खियां हैं."

प्रणवीर सिंह

वो कहते हैं, "मेरे पास 30 साल पुराने पतंग और मांझें हैं. वो ख़ास हैं क्योंकि ना ही आपको अब पुराने ज़माने वाला अच्छा काग़ज़ मिलेगा और ना ही धागा जिससे मांझा बनाया जाता है."

"अब तो उनमें से काफ़ी कंपनियां ही बंद हो गईं जो पतंग और मांझे के लिए सबसे उपयुक्त काग़ज़ और धागा बनाते थे. "

पिछले तीस सालों में वीरू भाई ने इतना पतंग और मांझा ख़रीद लिया है कि उनके घर में अब जगह नहीं है उन्हें रखने की.

इसीलिए उन्होंने अपने पतंग और मांझों को बेचना शुरू किया है. लेकिन वो उन्हीं लोगों को बेचते हैं जो अच्छे पतंगबाज़ हैं और उनके चीज़ों की सही क़द्र जानते हैं.

वे कहते हैं, "दूकानदार को अपना माल बेचना होता है पर पतंग मेरा शौक़ है. मैं सिर्फ़ जानकार लोगों को ही अपना सामान बेचता हूं."

वीरू भाई के अनुसार उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िला का मांझा मशहूर है.

उन्होंने बताया, "मैं बरेली जाता रहता हूं मांझे बनवाने."

वे कहते हैं, "मांझे में कांच की परत सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है. और दूसरा वह चीज़ जो कांच को धागे पर पकड़ कर रखे."

वीरू भाई कहते हैं, "पर हीरा कांच से ज़्यादा काट देते हैं मांझे को. इसलिए पतंगबाज़ी के बड़े-बड़े शौक़ीन उसमें हीरे को तराशते वक़्त जो चूरा निकलता है, उसकी परत चढ़वातें हैं मांझों पर. वो ज़्यादातर जयपुर के होते हैं. वहां हीरे को तराशने का काम भी होता है और पतंग के शौक़ीन भी हैं."

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