लद्दाख़ के गांव में मुसलमानों का 'बहिष्कार'

अब्दुल करीम शेख़ कहते हैं कि बौद्धों के ज़रिये चलाये जाने वाले स्कूलों में मुस्लिमों को दाख़िला नहीं मिल पाता है.
इमेज कैप्शन, अब्दुल करीम शेख़ कहते हैं कि बौद्धों के ज़रिये चलाये जाने वाले स्कूलों में मुस्लिमों को दाख़िला नहीं मिल पाता है.
    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के जंस्कार में मुसलमान बौद्धों पर उनके सामाजिक बहिष्कार का आरोप लगा रहे हैं.

जंस्कार के पदुम गाँव के मुसलमानों का कहना है कि बौद्ध न तो मुसलमानों को सामान बेचते हैं, न ख़रीदते हैं और इस नियम को तोड़ने वालों पर 10,000 रुपयों का जुर्माना लगाया जाता है.

कारगिल एग्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य चुरिन्ग अंदौस सामाजिक भेदभाव की बात से इनकार करते हैं लेकिन मानते हैं कि पहले ऐसा हुआ था.

पदुम गांव के अब्दुल क़रीम शेख़ दावा करते हैं कि मुसलमानों के बच्चों को बौद्ध स्कूलों में दाख़िला नहीं दिया जाता है.

सादिक़ शेख़ अपने परिवार के साथ.
इमेज कैप्शन, सादिक़ शेख़ अपने परिवार के साथ.

अब्दुल क़रीम शेख़ ने धर्म परिवर्तन किया है और पहले उनका नाम कसांग गलसान था.

साल 2012 में पदुम गाँव के 22 बौद्ध ने इस्लाम क़बूल कर लिया था. सामाजिक बहिष्कार की ख़बरें तबसे ही आनी शुरू हुई है.

चुरिन्ग अंदौस कहते हैं कि जंस्कार के मुसलमानों ने हाल में इस्लाम कबूल करने वालों से ठीक से मिलने नहीं दिया है. वो मुस्लिमों पर भी पूरे मामले को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने का आरोप लगाते हैं.

हालांकि वो कहते हैं कि नए मुसलमानों और बौद्धों में मनमुटाव है लेकिन उनके अनुसार इसकी वजह स्थानीय अधिकारी हैं.

जंस्कार में मुसलमानों की कुल आबादी 700 के क़रीब है जबकि यहां 14,000 के आसपास बौद्ध रहते हैं.

फ़ैयाज़ अहमद वानी मुसलमानों के संगठन शाइनिंग स्टार के मुखिया हैं.

उनका इलज़ाम है कि इस्लाम अपनाने वालों को बराबरी का दर्जा नहीं मिल पा रहा है.

जंस्कार जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र का हिस्सा है और इसके दो ज़िलों - कारगिल और लेह में से जहां कारगिल में तक़रीबन 70 प्रतिशत मुसलमान रहते हैं वहीं लेह में 65 बौद्ध हैं.

पदुम के नंबरदार अयूब खान ने बीबीसी को बताया कि जिन परिवारों ने मज़हब बदला वो दलित थे.

अंदौस का मानना है कि इस मसले का हल सामाजिक सतह पर ही निकाला जा सकता है.

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