सरकारी नियंत्रण बनाम निजीकरण की बहस शुरू

वसुंधरा राजे, राजस्थान
प्रकाशित

राजस्थान सरकार ने जनवितरण प्रणाली(पीडीएस) की दुकानों पर ब्रांडेड चीज़ों की बिक्री के लिए एक निजी कंपनी फ़्यूचर ग्रुप के संग समझौता किया है.

सरकार के इस फ़ैसले की कई सामाजिक संगठन आलोचना कर रहे हैं. उनका कहना है कि सरकार राशन की दुकानों को निजी हाथों में सौंप रही है.

राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार के इस फ़ैसले समेत पिछले कुछ-कुछ समय में लिए गए अन्य निर्णयों से सरकारी नियंत्रण बनाम निजीकरण की बहस शुरू हो गई है.

इसी मुद्दे पर वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार शंकर अय्यर से बात की बीबीसी संवाददाता अनुराग शर्मा ने.

पढ़ें बातचीत के प्रमुख अंश

राजस्थान सरकार के फ़ैसले को आप किस तरह देखते हैं?

ये क़दम अच्छा है या बुरा ये तब पता चलेगा जब इसे अमल में आने का समय दिया जाए.

सरकार की बुनियादी नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वो जनता को क़ानून-व्यवस्था, भोजन और शिक्षा जैसी जीवनयापन के लिए ज़रूरी सुविधाएँ प्रदान करे.

पिछले कुछ समय से हम देख रहे हैं कि सरकार अपनी ज़िम्मेदारी में विफल हो रही है.

इस देश के 30-35 प्रतिशत बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं. सरकारी स्कूलों का बजट बढ़ता जा रहा है लेकिन लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलो में भेजना चाहते हैं.

इसी तरह सरकारी अस्पतालों पर ख़र्च बढ़ता जा रहा है लेकिन लोग निजी अस्पतालों में इलाज कराना चाहते हैं.

संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुसार देश में जितने पुलिसवालों की ज़रूरत है उससे उनकी संख्या बहुत कम हैं.

आपको लगेगा कि पुलिस की भर्ती से रोज़गार भी तैयार होगा और लोगों को सुरक्षा भी मिलेगी लेकिन कोई सरकार इस दिशा में क़दम नहीं उठा रही.

ज़मीनी हक़ीक़त ये है कि इस देश में क़रीब 17 लाख पुलिसकर्मी हैं और 70 लाख सिक्योरिटी गॉर्ड हैं जो निजी कंपनी के कर्मचारी होते हैं.

इसलिए कई कामों को निजी हाथों में सौंपने की बात कही जा रही है.

मोबाइल फ़ोन

हमारे देश में दूरसंचार सेवाएं जब एमटीएनएल और वीएसएनएल के पास थीं तो लोगों को फ़ोन के लिए सालों इंतज़ार करना पड़ता था.

जब दूरसंचार क्रांति हुई और इसे निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया तो पूरा परिदृश्य बदल गया.

इसी तरह निजी विश्वविद्यालय खोलने की अनुमति देने के बाद लोगों को ज़्यादा सहूलियत मिली.

लेकिन अभी ये देखने की बात है कि किस हद तक सरकार पीछे हटेगी और आम लोग अपने पैसे देकर बुनियादी सुविधाएँ ख़रीदेंगे.

राजस्थान में कुछ दिनों पहले राज्य सरकार ने एक अप्रोच पेपर निकाला है. जिसमें सरकार ने कहा है कि निजी संस्थाएँ आकर सरकारी स्कूल चलाएं.

सरकार इन संस्थाओं को बच्चों की फ़ीस दे देगी बाक़ी स्कूल चलाने का काम उनका होगा. कई राज्यों में इस तरह के कई प्रयोग चल रहे हैं.

मजदूर और मोबाइल

इतना तो साबित हो चुका है कि सरकारी ढांचा अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने में विफल रहा है. निजी कंपनियाँ इन क्षेत्रों में क्या बेहतर काम कर पाएंगी, ये अलग सवाल है.

दूरसंचार के क्षेत्र में देखें तो निजी कंपनियाँ सफल रही हैं. लेकिन बिजली के क्षेत्र में निजी कंपनियों का प्रदर्शन मिलाजुला रहा है.

जैसे मुंबई में बिजली कंपनियों के काम की लोग तारीफ़ करते हैं, दिल्ली में लोग उनकी काफ़ी आलोचना करते हैं.

इस मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों को एक साथ बैठकर विचार करना होगा. सभी को सोचना होगा कि किन क्षेत्रों को निजी हाथों में सौंपा जा सकता है और किन्हें नहीं सौंपा जा सकता.

एक और उदाहरण देना चाहूँगा. पहले सीपीडब्ल्यूडी और पीडब्ल्यूडी सरकारी सड़कें बनाती थीं. इसलिए जब गाड़ी बिकती थी तो सरकार टैक्स लेती थी.

आप गाड़ी ख़रीदते वक़्त एक्साइज़ टैक्स और रोड टैक्स देते हैं. जब आप गाड़ी चलाते हैं तो जिस जिस रोड से आप गुज़रते हैं वहाँ टोल टैक्स देते हैं.

स्कूल भारत

चूँकि सरकार अब रोड बना नहीं पा रही है तो वो रोड बनाने का काम निजी कंपनियों को दे रही है. निजी कंपनियाँ जब सड़क बनाती हैं तो आप से टोल टैक्स लेती हैं.

रमन सिंह, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में भाजपा की ही सरकार है लेकिन वहाँ सरकारी पीडीएस सिस्टम काफ़ी सफल है?

एक ही पार्टी है लेकिन नेता अलग-अलग हैं. रमन सिंह की सोच अलग होगी, वसुंधरा राजे शायद उनसे अलग सोच रखती होंगी.

लेकिन एक सच्चाई ये है कि सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की हो, सरकारी ढांचे से काम कराने में काफ़ी मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है.

पिछले कई सालों का चुनावी इतिहास देखें तो जिस भी मुख्यमंत्री ने सरकारी कर्मचारियों को अनुशासन में लाने की कोशिश की है वो अगला चुनाव हार गया है.

दिग्विजय सिंह ने जब स्कूल में हाज़िरी वग़ैरह में सुधार लाने की कोशिश की तो वो चुनाव हार गए. एके एंटनी के साथ भी ऐसा ही हुआ था. वसुंधरा राजे के साथ भी पिछली बार यही हुआ था.

सीपीएम

अलग-अलग मुख्यमंत्रियों की इसपर अलग सोच है. पश्चिम बंगाल या केरल में देखें तो वहाँ वामपंथी पार्टियों की सरकार आती जाती रहती हैं लेकिन त्रिपुरा में चार बार से लगातार वामपंथी सरकार है.

कई राज्यों में काम हो जाता है और कई राज्यों में नहीं होता. जैसे महाराष्ट्र में सड़क बनाने का काम शुरू हो तो ये तय है कि वो एक समय सीमा में हो जाएगा लेकिन बिहार, यूपी या झारखंड में इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती.

पावर प्लांट की बात करें तो बिहार, मध्य प्रदेश या राजस्थान में आप आसानी से लगा लेंगे लेकिन महाराष्ट्र में आपको इसके लिए ज़मीन पाने में मुश्किल हो जाएगी. यानी अलग-अलग राज्यों की समस्याएं अलग अलग हैं.

राजस्थान

सरकार के समझौते के तहत फ़्यूचर ग्रुप सामान पर सब्सिडी देगा, चीज़ों का दाम सरकार तय करेगी, क्या इससे आम लोगों को फ़ायदा मिलेगा?

इसकी हमें क्यों उम्मीद करनी चाहिए...मैं एक उदारहण देना चाहूँगा सरकारी दफ़्तरों में आपकी ज़मीन की ट्रांसफ़र या रजिस्ट्रेशन के काग़ज़ात पड़े रहते थे. उनका डिजिटाइजेशन नहीं किया गया.

कर्नाटक और महाराष्ट्र इत्यादि राज्यों में सरकार ने निजी कंपनियों के साथ मिलकर सरकारी दस्तावेज़ों का डिजिटाइजेशन किया. इससे बड़े पैमाने पर जनता को लाभ मिला.

राजस्थान के मामले में ध्यान रखें कि उचित मूल्य की दुकानें निजी दुकानें होती हैं. उनकी मालिक सरकार नहीं होती. सरकार उन्हें लाइसेंस देती है. उनपर पाबंदी होती है कि वो और कोई कारोबार नहीं कर सकते. बदले में सरकार उन्हें छूट वग़ैरह देती है.

ऐसी दुकानों में जिस तरह की दिक़्क़तें सामने आती रही हैं उसे देखते हुए कई राज्यों में ये विचार सामने आया है कि इन्हें क्यों न निजी कंपनियों को दे दिया जाए. और लोग वहां जाकर इन्हें ले लें.

इसका कारगर उपाय ये है कि सरकार ग़रीब लोगों के रोज़मर्रा की चीज़ों राशन, चीनी, तेल इत्यादि की उपलब्धता सुनिश्चित करे.

ये चीज़ें चाहें राशन की दुकान पर मिलें या फ़्यूचर ग्रुप की दुकानों पर, वो मिलनी चाहिए. सरकार को ग़रीबों के बैंक एकाउंट में सीधे पैसे जमा कर देना चाहिए जिससे वो ये चीज़ें ख़रीद सकें.

राजस्थान

अभी तो सरकार ग़रीबों के नाम पर जो ख़र्च करती है वो उन तक कितना पहुँचता है ये किसी को नहीं पता.

अभी पिछले साल पीडीएस सिस्टम पर आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पीडीएस की तहत दिए जाने वाले राशन का 40 प्रतिशत ग़रीबों तक पहुँचता नहीं.

आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, छ्त्तीसगढ़ जैसे राज्यों में पीडीएस सिस्टम बहुत अच्छा चल रहा है इसलिए वहाँ पर निजीकरण किया जाएगा तो भूचाल आ जाएगा.

लेकिन राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में इसकी हालत काफ़ी ख़राब है तो वहाँ कुछ भी सुधार आया तो लोगों को लगेगा कि ये अच्छा है.

राजस्थान में जो किया जा रहा है वो कारगर होगा या नहीं ये साल-छह महीने में दिख जाएगा.

वसुंधरा राजे

पहले श्रम, शिक्षा और बिजली क्षेत्र के बाद अब पीडीएस सिस्टम से जुड़े वसुंधरा राजे सरकार के हालिया फ़ैसलों से सवाल उठ रहे हैं कि वो एक नई राजनीति के तहत राज्य में निजीकरण की तरफ़ बढ़ रही हैं?

सवाल ये है कि क्या वो ये अपनी मर्ज़ी से कर रही हैं. जिन चार क्षेत्रों का आपने ज़िक्र किया राजस्थान में ये चारों क्षेत्र आईसीयू में हैं.

इन सभी क्षेत्रों में राजस्थान की हालत बहुत ज़्यादा ख़राब है. अगर किसी मरीज़ को सर्जरी की ज़रूरत है तो आप वही करेंगे.

राज्य सरकार ने जो फ़ैसले लिए हैं उनकी सफलता या विफलता कुछ समय में पता चलेगी. मुझे नहीं लगता कि ये कोई वैचारिक परिवर्तन है. हर राज्य अपनी ज़रूरत के हिसाब से फ़ैसले ले रहा है.

मुझे लगता है कि ये सब वसुंधरा की मजबूरी है. पहले भी सरकारें अपनी मजबूरियों को ख़ूबी बताकर पेश करती रही हैं.

राजस्थान में ये प्रयोग सफल होंगे तो बाक़ी राज्य उन्हें अपना सकते हैं. लेकिन राज्य सरकार और फ़्यूचर ग्रुप को अभी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>