जनता या पैसा, किसे चुनेगा ट्राई?

दिल्ली मे प्रदर्शन
    • Author, मानसी दाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • प्रकाशित

पिछले कुछ हफ्तों से भारत में नेट न्यूट्रैलिटी काफ़ी चर्चा में रही है.

मोबाइल ऐप का इस्तेमाल कर इंटरनेट के ज़रिए की जाने वाली फ़ोन कॉल्स के लिए टेलीकॉम कंपनियां (जिसमें देश की इंटरनेट कंपनियां भी शामिल हैं) अलग कीमत तय करने की <link type="page"><caption> कोशिश कर रही</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/04/150401_internet_network_neutrality_vr" platform="highweb"/></link> हैं.

इस साल 27 मार्च को भारतीय टेलीकॉम नियामक, ट्राई ने ओवर-द-टॉप सर्विसेज़ के लिए नियम बनाने की कोशिश में <link type="page"><caption> कंसलटेशन पेपर</caption><url href="http://www.trai.gov.in/WriteReaddata/ConsultationPaper/Document/OTT-CP-27032015.pdf" platform="highweb"/></link> के ज़रिए जनता से राय मांगनी शुरू की थी.

लोगों के लिए इस पर राय देने के लिए 24 अप्रैल तक की समय सीमा दी गई थी. ट्राई को इस पर दस लाख से ज़्यादा ईमेल मिले हैं.

नेट न्यूट्रालिटी पर आगे क्या होगा

मुद्दा कहीं बड़ा है

मीडियानामा के निखिल पहवा कहते हैं कि इस मुद्दे को दो हिस्सों में समझा जा सकता है.

पहला जिसमें विदेशी कंपनियों (हर वह कंपनी जो मोबइल के ज़रिए उपभोक्ता तक पहुंचना चाहती है, जैसे व्हाट्सऐप, लाइन, वाइबर या ख़बरों की वेबसाइट्स) को भारतीय जनता के पास मोबाइल पर पहुंचने के लिए सरकार से लाइसेंस लेना पड़ सकता है.

दूसरा यह कि दुनिया की सारी या कुछ इंटरनेट कंपनियों को भारत में टेलीकॉम ऑपरेटर्स के साथ रेजिस्ट्रेशन करना पड़ेगा. ऐसे में उपभोक्ता को वही चीज़ें देखने को मिलेगी जो टेलीकॉम ऑपरेटर दिखाना चाहते हैं.

नेट न्यूट्रालिटी के लिए प्रदर्शन
इमेज कैप्शन, अमरीका में यह बड़ा मुद्दा बना. राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपील की थी कि नेट न्यूट्रैलिटी को माना जाए.

निखिल कहते हैं कि दोनों ही बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे हैं.

स्वतंत्र रिसर्चर और तकनीकी सलाहकार विक्रम कृष्णा कहते हैं कि यह विकास के लिए ठीक नहीं. नई उभरती हुई कंपनियों को आगे बढ़ने का मौका ही नहीं मिल पाएगा और देश में इनोवेशन संभव ही नहीं हो पाएगा.

आगे है चुनौतियां

नेट न्यूट्रालिटी पर आगे क्या होगा
नेट न्यूट्रालिटी पर आगे क्या होगा
नेट न्यूट्रालिटी पर आगे क्या होगा
नेट न्यूट्रालिटी पर आगे क्या होगा

वरिष्ठ टेक्नोलॉजी लेखक प्रशांतो कुमार रॉय का कहना है कि हालाँकि इंटरनेट डॉट ओआरजी स्वयं नेट न्यूट्रैलिटी का विरोध करता मोबाइल वेब प्रोजेक्ट है, जिसके माध्यम से कुछ चुनिंदा वेबसाइट्स का मु़्फ़्त एक्सेस दिया जाता है- इस तरह की सुविधाओं का होना बुरा नहीं, क्योंकि इनके होने से इंटरनेट इस्तेमाल नहीं करने वाले भी इंटरनेट का स्वाद पा सकेंगे.

पर इसका यह मतलब क़तई नहीं कि इंटरनेट केवल कुछ चुनी हुई वेबसाइट को दिखाने का प्लेटफॉर्म बना दिया जाए. सरकार को यह समझने की ज़रूरत है.

<bold>पढ़ें <link type="page"><caption> 'नेट न्यूट्रैलिटी' का मतलब आख़िर है क्या?</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/04/150401_internet_network_neutrality_vr" platform="highweb"/></link></bold>

नेट न्यूट्रालिटी पर आगे क्या होगा

अब सरकार किसकी सुनेगी, पैसे के ढ़ेर पर बैठी कंपनियों की जो आपके पास आने वाले डाटा पर क़ाबू करना चाहते हैं या उन लोगों की जिनके लिए इंटरनेट जानकारी पाने, पढ़ाई करने, कला सीखने या फिर दोस्तों के साथ जुड़े रहने का ज़रिया बन चुका है?

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>