'मनरेगा बंद हुआ तो हम ग़ुलाम हो जाएंगे’

मनरेगा बंद होने की आशंका से चिंतित हैं लोग
    • Author, मनीष शांडिल्य
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

अररिया ज़िले का पलासी गांव बिहार के ऐसे कुछ गिने-चुने गांवों में है, जहां महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत मज़दूर काम कर रहे हैं.

मनरेगा पर नज़र रखने वालों के मुताबिक़ पैसे की कमी से जूझ रहे इस कार्यक्रम के तहत अभी बिहार ही नहीं पूरे भारत में बमुश्किल काम चल रहा है.

इसके भविष्य को लेकर कई तरह की आशंकाएं खड़ी हो गई हैं.

क्या सोचते हैं मनरेगा मज़दूर, पढ़ें विस्तार से

'मज़दूरी वहां जहां नक़द पैसे मिलें'

मनरेगा बंद होने की आशंका से चिंतित हैं लोग

पलासी में कच्ची सड़क पर मिट्टी चढ़ाने का काम चल रहा है. पिछले हफ़्ते यहां हमें इक्के-दुक्के मर्द ही मिले थे जो मनरेगा में काम कर रहे थे. ज़्यादातर महिलाएं ही थीं.

मोहम्मद अयूब ने इसकी वजह बताई और एक बड़ी समस्या सामने रख दी.

अयूब कहते हैं, ‘‘मनरेगा के तहत भुगतान मिलने में काफ़ी देर हो जाती है. ऐसे में परिवार का मर्द ऐसी जगह मज़दूरी करता है जिसमें नक़द पैसे मिलें.’’

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लुंगी और गंजी में अलीमुद्दीन सड़क से थोड़ी दूर मिट्टी काट रहे थे और तलीमा उसे टोकरी में भरकर सड़क के किनारे डाल रही थीं.

दोपहर के आसपास जब सभी मज़दूरों ने खाने के लिए काम रोका तो अलीमुद्दीन और तलीमा से बात हो पाई.

तलीमा बताती हैं, "मनरेगा साइट पर आने के पहले अपने पांच बच्चों के लिए दिन का खाना पकाकर और अपना खाना बांधकर निकलते हैं.’’

‘जानकारी नहीं थी’

मनरेगा से गांवों में विकास हुआ, लोगों को  रोज़गार मिला

कलीमुद्दीन बताते हैं कि वे बीते पांच साल से मनरेगा के तहत मज़दूरी कर रहे हैं.

मनरेगा शुरू हुए क़रीब नौ साल हो गए, वे पांच साल से ही क्यों काम कर रहे हैं?

यह पूछे जाने पर अलीमुद्दीन कहते हैं, "पहले इसके बारे में जानकारी नहीं थी. मुखिया ठेका मज़दूरों से काम कराते थे."

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वे अंगुलियों पर हिसाब लगाकर बताते हैं, ‘‘पिछले कुछ साल में औसतन लगभग महीना दिन का काम मनरेगा में मिल जाता था.’’

आंकड़े भी बताते हैं कि इस वित्तीय वर्ष में अभी तक 34 दिनों तक का ही रोज़गार दिया जा सका है.

कलीमुद्दीन को मनरेगा के तहत मिला काम तसदीक करता है कि जैस-जैसे लोग इसके बारे में सीख रहे थे, जानने लगे थे, वैसे ही काम कम होने लगा था.

'पंजाब जाते थे'

मनरेगा बंद होने की आशंका से चिंतित हैं लोग

अलीमुद्दीन मनरेगा का काम करने के पहले भी मज़दूर ही थे और उन्हें काम की तलाश में सूबे से बाहर भी जाना पड़ता था.

वे बताते हैं, ‘‘बड़ी दिक़्कत से घर चलता था. काम की तलाश में पंजाब आलू उखाड़ने या धान और गेहूं काटने जाना पड़ता था.’’

अलीमुद्दीन के अनुसार जब से उन्हें मनरेगा में काम मिला है तब से उन्हें दिल्ली-पंजाब नहीं जाना पड़ता.

'परेशानियां दूर हुईं'

मनरेगा से मिले पैसों से अलीमुद्दीन के घर की हालत भी सुधरी है.

वे बताते हैं, ‘‘मैंने फूस की छत की जगह टीन की छपड़ी डाल दी है. घर मज़बूत करने के लिए सीमेंट का खंभा भी लगवा दिया है.’’

वहीं तलीमा बताती हैं, "हम लोगों ने भी मिट्टी काटकर कुछ कर लिया. हम बच्चों को पढ़ा पाते हैं, इलाज कराने में भी सुविधा होती है. बहुत सारी परेशानियां मनरेगा के पैसे से दूर हो गईं."

मनरेगा से गांव को भी सड़क और तालाब मिले हैं.

'अब सौ रुपए मिल जाते हैं'

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जब मनरेगा का कम नहीं रहता तो अलीमुद्दीन या तो खेतों में मजदूरी करते हैं या फिर भवन निर्माण मज़दूर बन जाते हैं.

अलीमुद्दीन के मुताबिक़ मनरेगा की वजह से दूसरे कामों में भी अब पहले से दुगुनी मज़दूरी मिलती है. वे बताते हैं, "दिन भर के काम के लिए अब सौ रुपए मिल जाते हैं जबकि मनरेगा शुरू होने के पहले हमें 50 रुपए ही मिलते थे."

वे आगे बताते हैं, "किसान शिकायत करते हैं कि मनरेगा के कारण उन्हें अब ज़्यादा मजदूरी देनी पड़ती है.’’ वहीं तलीमा बताती हैं कि उन्हें अब भी मजदूरी के बदले नक़द नहीं, अनाज ही मिलता है.

कलीमुद्दीन दंपत्ति के अनुसार मनरेगा से अब वे पहले के मुक़ाबले ज़्यादा सुखी हैं. वह उन आशंकाओं से भी वाकिफ़ हैं जो हाल के दिनों में इसके बारे में जताई जा रही हैं.

कलीमुद्दीन कहते हैं, "सुना है कि मनरेगा बंद हो जाएगा. मनरेगा नहीं चलेगा."

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कलीमुद्दीन के अनुसार उन जैसे लाखों लोग मनरेगा को कायम रखने के लिए साथ हैं.

'बच्चों का पेट कैसे भरेंगे'

पिछले महीने जन जागरण शक्ति संगठन के बैनर तले दिल्ली के जंतर-मंतर जाकर वे मनरेगा ख़त्म न करने और मज़दूरी बढ़ाने के लिए आवाज़ भी बुलंद कर चुके हैं.

अगर मनरेगा ख़त्म कर दिया जाए तो आपकी ज़िंदगी पर क्या असर पड़ेगा?

यह पूछे जाने पर अलीमुद्दीन बुझी आवाज़ में कहते हैं, "हमारी बहुत बुरी स्थिति हो जाएगी. हमें ग़ुलाम बनकर रहना पड़ेगा. हम पैसे-पैसे को मोहताज हो जाएंगे."

इस सवाल पर तलीमा कहती हैं, "बच्चे रोएंगे तो हम उनका पेट कैसे भरेंगे."

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