मिट्टी पर लग ही गया मैट का धोबीपाट

कुश्ती
    • Author, सुशांत एस मोहन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई
  • प्रकाशित

भारत में कुश्ती का इतिहास बहुत पुराना है. हिंदू पौराणिक कथाओं में भी कुश्ती या मल्ल युद्ध का ज़िक्र मिलता है. लेकिन कुश्ती के खेल में बीते सालों में कई बड़े बदलाव आए हैं. भारत में कैसी रही कुश्ती की यात्रा ? और क्या मायने हैं एक पहलवान होने के ?

<bold><documentLink href="/hindi/multimedia/2014/12/141231_pahalwan_story_video_one_pkp" document-type="video"> (देखिए: कुश्ती में बदलाव की कहानी)</documentLink></bold>

इन्हीं सब विषयों का अवलोकन करती बीबीसी हिन्दी की इस विशेष शृंखला की पहली कड़ी.

पढ़ें रिपोर्ट विस्तार से

कुश्ती

भारतीय खेल प्रेमियों को आगामी ओलिंपिक में जिस खेल से मेडल मिलने की ख़ासी उम्मीद वो है कुश्ती.

सुशील कुमार, योगेश्वर दत्त, अमित दहिया और राजीव तोमर जैसे पहलवानों के दम पर भारत को विश्व फ़्री स्टाईल कुश्ती की सबसे मज़बूत टीमों में से एक माना जाता है.

1982 के एशियाड खेलों में भारत के लिए स्वर्ण जीतने वाले पूर्व पहलवान सतपाल ने बीबीसी को बताया, "सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त जैसे पहलवानों ने भारत की कुश्ती की धरोहर को ज़िंदा रखा हुआ है."

सुशील कुमार

विश्व स्तर के खेलों में आज कुश्ती सिंथेटिक के कपड़े से बने मैट पर होने लगी है.

लेकिन कुश्ती के विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय पहलवानों के इस खेल में दबदबे का असली कारण अखाड़ों में होने वाली मिट्टी की कुश्ती है.

अखाड़े का इतिहास

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भारत में प्राचीन काल से कई अखाड़े चले आ रहे हैं जो देश के कई बड़े पहलवानों के लिए ट्रेनिंग ग्राउंड रहे हैं.

125 किलोग्राम भारवर्ग के भारतीय पहलवान राजीव तोमर वैसे तो अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में मैट पर लड़ते हैं लेकिन अपने अभ्यास के लिए दिल्ली के रोशनारा बाग़ इलाके में स्थित हनुमान अख़ाड़े में जाते हैं.

राजीव कहते हैं, "पहलवानी में बच्चा जैसे ही खेलने आता है उसे पहले अखाड़े की मिट्टी में हल चलाना सिखाया जाता है. मिट्टी की कुश्ती न सिर्फ़ मैट से कठिन होती है बल्कि इसमें ज्यादा ताकत भी लगती है ऐसे में एक पहलवान जो मिट्टी में अभ्यास कर के आया है वो मैट पर अपने प्रतिद्वंद्वी को आसानी से चित्त कर सकता है."

सबसे पुराना अखाड़ा

लल्ला पहलवान, बद्री अखाड़ा, दिल्ली
इमेज कैप्शन, बद्री अखाड़े, दिल्ली के संचालक लल्ला पहलवान

भारत में यूं तो अनेक अखाड़े हैं लेकिन अगर पुराने अखाड़ों कि बात करें तो महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में पुराने अखाड़े मौजूद हैं.

लेकिन चलते हुए सबसे पुराने अख़ाड़े को लेकर दो दावेदार हैं. पहला दिल्ली का गुरु हनुमान अखाड़ा जिसकी नींव 1925 में डाली गई थी और दूसरा बद्री का अखाड़ा जिसके संचालक लल्ला पहलवान दावा करते हैं कि उनके अखाड़े कि नींव 1923 में रखी गई थी.

इन दोनों ही अखाड़ों के बीच खुद को पुराना साबित करने कि होड़ है लेकिन आधिकारिक काग़ज़ों से दोनों की ही दावेदारी साफ़ नहीं हो पाती.

अखाड़े की मिट्टी महत्व

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अगर कुश्ती के पुराने किस्से कहानियों कि बात करें तो पहलवानों के बीच बातें होती रहती हैं कि अखाड़े की मिट्टी में जादू होता है.

पुराने पहलवान दावा करने से नहीं चूकते कि इस मिट्टी से चोट नहीं लगती और कभी चोट लगी भी हो तो उस चोट को भी ये मिट्टी ठीक कर लेती है.

चोट ठीक होने के साथ साथ ही ये भी कहा जाता है कि अखाड़े की इस मिट्टी में दूध से बना मठ्ठा भी डाला जाता है, जिससे ये मिट्टी मुलायम बन जाती है.

ओलंपिक रजत और कांस्य पदक विजेता सुशील कुमार कहते हैं, "अखाड़े की मिट्टी में औषधीय गुण होते हैं. इसमें हल्दी मिलाई जाती है, मेंहदी डाली जाती है, साथ ही गरम तेल से इसे घुमाया जाता है. ये मिट्टी इतनी गुणकारी होती है कि कई पहलवान चोट लगने पर इससे सेंक भी लगाते हैं."

लेकिन दूध और मट्ठे मिलाए जाने की बात पर सुशील कहते हैं कि ऐसा प्राचीन काल में किया जाता था अब नहीं.

मैट के आगे दम तोड़ती मिट्टी

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भारत में मिट्टी की कुश्ती कितनी भी लोकप्रिय क्यों न हो लकिन वर्तमान में पूरे विश्व में कुश्ती मैट पर खेली जाती है और मिट्टी की कुश्ती मैट के आगे दम तोड़ती जा रही है.

देश की राजधानी दिल्ली में स्थित बद्री अखाड़े में आज भी आपको मिट्टी से सने पहलवान दो-दो हाथ करते नजर आ जाएंगे.

इस अख़ाड़े को चलाने वाले लल्ला पहलवान बताते हैं, "अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मैट के आ जाने से अब मिट्टी की कुश्ती सिमटती जा रही है. पहलवान जो देश के लिए मेडल लाना चाहते हैं उन्हें मिट्टी में खेलने का कोई उत्साह नहीं है. मिट्टी की कुश्ती के प्राचीन दांव जैसे कलाजंग, सांडीतोड़ मैट पर उतने प्रभावी नहीं होते."

दंगल के कद्रदान

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लेकिन भारत के गांव-देहातों में आज भी मिट्टी में होने वाले दंगलों की लोकप्रियता है और पहलवानों को इन दंगलो में लड़ने के लिए भारी इनामी राशि मिलती है.

भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने वाले राजीव तोमर 10 लाख रुपए के इनाम के लिए गांव देहात के दंगलो में भाग लेने जाते हैं जहां कुश्ती देखने के लिए आया लोगों का हुजूम ये बताता है कि कुश्ती ने मिट्टी से मैट तक का सफ़र तय करना शुरू किया है लेकिन अभी इसे पूरा नहीं किया है.

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